Friday, January 4, 2013

जैन मुनि पर हमला: अहिंसक जैन समाज में आक्रोश


गुजरात : दिगंबर जैन मुनि पर प्राणघातक हमला, दो श्वेताम्बर मुनियों को ट्रक ने कुचला
इन दुर्घटनाओं के विरोध में जैन समाज ने की बोरीवली में आपात बैठक

मुंबई
२ जनवरी २०१३। जैन धर्मावलंबियों के लिए नववर्ष दुखद घटनाएँ लेकर आया है. एक दुर्घटना गिरनार, जूनागढ़ की है तो दूसरी भरूच की है. इन दुर्घटनाओं के विरोध में जैन समाज ने की बोरीवली में आपात बैठक का आयोजन किया, जिसमें बृहत् मुंबई के सभी उपनगरों एवं दक्षिण मुंबई से काफी संख्या में समाज के गणमान्य सदस्यों एवं श्रावकों ने भाग लिया. 

जैन मुनि पर हुए हमले के विरोध में सम्पूर्ण जैन समाज आगामी 7 जनवरी  २०१३ को प्रातः ९ बजे से हीरा बाज़ार से आजाद मैदान तक मुंह पर काली पट्टियां बांधकर विरोध रैली निकालेगा और प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति एवं गुजरात के मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन महाराष्ट्र के राज्यपाल को सौंपा जाएगा । 

ज्ञात हो कि 1 जनवरी को सायं ६ बजे मुनिश्री प्रबल सागर जी महाराज सिद्धक्षेत्र गिरनार (गुजरात) में पांचवी टोंक (कमल कुण्ड) से वापसी कर रहे थे, तब कुछ असामाजिक तत्वों एवं स्थानीय पंडों द्वारा मुनिश्री पर चाकुओं से प्राणघातक हमला किया गया, इसमें मुनिश्री के पेट में ५ घहरे घाव हुए और काफी रक्त बहता रहा जिससे मुनि तुरंत बेहोश हो गए. घायल अवस्था और कडाके की ठिठुरती ठण्ड में भी दिगंबर मुनि घंटों पहाड़ पर ही पड़े रहे, रात को करीब १ बजे उन्हें पालकी वालों ने पहाड़ से नीचे उतारा और फिर रोगिवाहिका से जूनागढ़ के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ उनका ऑपरेशन हुआ पर अभी भी उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है.

ध्यान दें कि दिगंबर मुनि दीक्षा लेने के बाद कभी भी किसी प्रकार के वाहन का इस्तेमाल नहीं करते और ना ही रात्रिकाल में एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं. दिन में एक बार ही आहार-जल ग्रहण करते हैं. सभी जीवों के प्रति करुणा से ओतप्रोत होते हैं. हमेशा पैदल ही विहार करते हैं और सर्दी-गर्मी अथवा बरसात में भी किसी प्रकार के आवरण का इस्तेमाल नहीं करते. मयूरपंख से बनी पिच्छिका एवं कमंडल के अलावा कोई भी वस्तु अपने साथ नहीं रखते और रोगी होने पर भी चिकित्सालय में जाकर उपचार नहीं लेते हैं. यह सब उनकी दीक्षा के प्राथमिक नियम होते हैं. इस घटनाक्रम से मुनिश्री की दीक्षा का विच्छेद हो गया है क्योंकि उन्हें बेहोश अवस्था में ही रात के समय अस्पताल में भर्ती कर दिया गया. जैनधर्म के इतिहास में यह दुर्घटना काले अध्याय के सामान है जिसे कभी समाज भुला नहीं सकता.

गिरनार तीर्थ पर जैनों और समाजकंटकों के बीच पिछले १५ वर्षों से विवाद चल रहा है जबकि मूल रूप से यह जैन तीर्थ जैनधर्म के २२ तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान् की निर्वाण स्थली है. जिसपर समाजकंटकों ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है जो हमेशा जैन तीर्थ यात्रियों को धमकाते रहते हैं, अभद्र व्यवहार करते हैं. गुजरात उच्च न्यायालय ने २१  दिसम्बर २००४ में गिरनार जी की पांचवी टोंक पर से अनधिकृत कब्जा और गैर-क़ानूनी रूप से स्थापित दत्तात्रय की मूर्ति को २८ दिसम्बर २००४ तक हटाने के आदेश दिए थे और यह भी आदेश दिए गए थे कि २८ दिसम्बर २००४ तक न हटाये जाने पर सम्बंधित विभागों को जबरन हटाने हेतु आदेश दिए जायेंगे! 

लेकिन मार्च
२००५ में हाई कोर्ट ने अपने २१  दिसम्बर २००४ के आदेश को बदलते हुए नए आदेश में भविष्य में पांचवी टोंक पर किसी भी नए निर्माण पर रोक लगा दी थी और एक कमेटी का गठन किया जिसे इस विषय में सारी जानकारी इकट्ठी करके अगले ६ महीनों में (मतलब नवम्बर, २००५ तक)..गुजरात उच्च न्यायालय को सौंपना था.
 
साथ ही इसी दिन
भरूच (गुजरात) के पास  पास राष्ट्रीय राजमार्ग ८  पर मंगलवार  को दो श्वेताम्बर जैन साधुओ  श्री ज्ञानेश्वर विजय महाराज और श्री हस्तिगिरी विजय  महाराज  को विहार के समय ट्रक से कुचला गया और वे घटनास्थल पर ही देवगति को प्राप्त हुए। ट्रक चालक दुर्घटना के बाद मौके से भाग निकले. गुजरात में पिछले २० दिनों में ऐसी १० घटनाएं हो चुकी हैं. जिनकी जाँच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए. भारत सरकार एवं गुजरात सरकार से ट्रक चालक को गिरफ्तार कर उस पर कानूनी कार्यवाही करने की मांग की।

मुनि पर इस हुए हमले की समस्त ने जैन समाज घोर निन्दा कर हमलावरों को गिरफ्तार कर उस पर कठोरतम कानूनी कार्यवाही करने एवं गिरनार तीर्थ पर पुलिस व्यवस्था कड़ी करने की मांग की।


Wednesday, January 2, 2013

चलो गिरनार: अभी नहीं तो कभी नहीं - हमारे तीर्थ/मंदिर और साधुओं को सुरक्षा दो, वर्ना गद्दी छोड़ो


[ घटना १: गुजरात के गिरनार पर्वत दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र पर १ जनवरी २०१३ को मुनिश्री १०८ प्रबल सागर जी महाराज पर पंडों द्वारा चाकुओं से प्राणघातक हमला, मुनि गंभीर, मुनि दीक्षा का हुआ विच्छेद, अस्पताल में करना पड़ा भर्ती.

घटना २: भड़ूच में दो श्वेताम्बर मुनियों की ट्रक से कुचलकर नृशंस हत्या कर दी गयी, जैन संघ के लिए ये दोनों घटनाएँ शोक लेकर आई हैं २०१३ का क्या है भविष्य)

देश के हर प्रदेश की जैन संस्थाएँ एक तारीख सुनिश्चित करके गिरनार और गुजरात की राजधानी ‘गांधीनगर में एक विशाल निकालें और गिरनार के पहाड़ पर कब्ज़ा करना चाहिए

जैन तीर्थों और जैन मुनियों की सुरक्षा एवं जैनों को अखिल भारतीय स्तर पर ‘अल्पसंख्यक’ दर्जे की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय  में तुरंत एक जनहित याचिका दाखिल की जानी चाहिए.

भारत की विकास दर और कर चुकाने के मामले में जैन समाज का योगदान सबसे ऊपर है फिर भी सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करती, हमारे मुनियों और तीर्थों पर हमलों की घटनाएँ हर दिन बढ़ रही हैं .

क्या हम अंधे, बहरे और लाचार हो गये है, कि हमे भिखारी समझा जा रहा है? या फिर हम एक अनचाहा अंग है भारत का? क्या भारत के अजैन जैनोंसे इतने असुरक्षित हैं कि उनपर, उनके तीर्थों और उनके आराध्य मुनियों पर हमले करना, उन्हें कुचलना ही एक बहुसंख्य समाज का आखरी रास्ता बचा है?

देशभर के सभी जैन व्यापारी चाहे दिगंबर हो या श्वेताम्बर एक दिन नक्की करो और उस दिन अपनी दुकानें, कम्पनियाँ, कारखाने, जैन सीए/सीएस/डॉ./वकील/इंजीनियर आदि के दफ्तर पूरी तरह बंद कर दो.
जब तक हम जैन  देशव्यापी व्यवसाय बंद नही करेंगे तब तक यह सरकार जागने वाली नही है।

जैनों के प्रतिनिधि मंडल देश की हर राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मिलें और ज्ञापन सौंपें. कह दो जब तक इन बातों का निराकरण नहीं हो जाता, विश्राम नहीं करेंगे. अब हमें इन सब हमलों का जवाब चाहिए. समाधान चाहिए. अब चुप नहीं बैठेंगे.

Saturday, November 10, 2012

Diwali Muhurat: Diwali in Jain Dharma 2012


There is a sequence to doing a puja. As per standard practise, we start with deva darshana, then circumambulate the Jina image three times while reciting the darshana patha {recitation while paying obeisance to the image of a Jina}. We bow our head in front of the image, which is seen as a symbolic representation of the supreme qualities of the Jina. 

We then recite the vinaya patha {Recitation of Humility}

We then recite the svasti patha {Recitation of the Names of the Auspicious Ones}

We then recite the first puja, which is the deva-shastra-guru puja {adoration of the auspicous triumvirate of god-scripture-preceptor }, the best known version of which was composed by Pandit Dyanataraya a few hundred years ago. On normal days, this puja is followed by a minimum of two otherpujas. One may do more pujas if one likes. But it is convention to carry out a minimum of three pujas. 

Mahavira puja (composed by Pt Dyanataraya) is performed on Dipavali day. The nirvana kanda {segment dealing with the liberation of the Jina} ofBhagavan Mahavira is recited by all present. At the conclusion of the nirvana kanda, a nirvana ladu {sweet offered to commemorate the liberation of the Jina} is offered with great devotion by all those present in the temple, to the Jina image. 

After finishing the puja, one offers the argha {devotional offering},  recites the shanti patha (in Sanskrit or in Hindi) and then recites the visarjana patha {formal leave taking}, which concludes the puja. 

This is the Mahavira puja as carried out in the temple. 

The same puja may be carried out at home as well. Jains normally do not have consecrated images of Jinas at home. So just place a nice framed photograph of Lord Mahavira on a table, light lamps in front of it and perform the puja as you would in a temple. 

After the puja, spend some time in solitude, reflecting upon the life and teachings of Tirthankara Mahavira. He was born a prince and yet he gave up all the trapping of luxurious life in order to become a naked ascetic wandering in the forest. He realised that eternal bliss could only be achieved by one who ceased indentifying with his body; followed the five vows of non-violence, truthfulness, non-stealing, purity of mind and body and detachment from material objects; controled the activities of his mind, speech and body; practised the five types of carefulness related to walking, eating, speaking, carrying and placing objects and disposal of bodily wastes; conquered his base passions of anger, arrogance, artifice and avarice; and attained a sense of oneness with the self. Mahavira immersed his consciousness in his self and attained supreme detachment and self-realisation. 

We must ponder upon his path and resolve to follow in his footsteps. I have found occasions like Dipavali are a great opportunity to look inwards and reflect upon my life, my conduct and whether it is capable of taking me on the path of spiritual emancipation. At all times, it is important to be honest. But especially so when we meditate upon the sublime teachings of the Jinas. It is best to carry out a self-assessment and see where we fall short of the teachings of Lord Mahavira. 

Each of us is capable of attaining liberation. The question is, do we really want it? If the answer is yes, are we willing to drop everything and focus completely on the path of self-realisation? If the answer is no, we need to think again, about what we want, whether we can actually get it, and even if we do, will it really give us the happiness we think it will?

I read somewhere, that we have endless sensual desires, but our capacity to partake of  sensual delectations is miniscule. Who are we kidding when we choose the pursuit of fleeting sensual pleasure over the attainment of lasting spiritual bliss? Only ourselves! 

The Tirthankaras are our ideals. We need to follow their teachings and live them. Unless we walk on the path of the Jinas, we cannot reach the destination that they reached - liberation. 

In devotion to the Jinas, and the Jain path of purification. 

Article by Manish Modi, Hindi Granth Karyalay

जैन धर्म में दीपावली

जैनधर्म के २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रत्यूष बेला (सूर्य की पहली किरण निकलने के साथ) में निर्वाण की प्राप्ति पावापुरी (नालंदा, विहार) से हुई थी इन्द्रों ने भगवान का निर्वाण कल्याणक बड़े ही धूमधाम से मनाया.

उसी दिन सायंकाल गोधूलि बेला में तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी  के प्रथम शिष्य गणधर श्री गौतम स्वामी को केवल ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी.

ये दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ आज से २५३९ वर्ष पूर्व घटित हुई थीं, तभी से भारतवर्ष में दीपावली का त्यौहार बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है.

इस दिन जैन धर्मावलंबी प्रातःकाल में शुद्ध वस्त्र धारण कर जिनालयों में जाते हैं और भगवान महावीर की पूजा करते हैं और 'निर्वाण कांड' पढ़कर निर्वाण कल्याणक महोत्सव मानते हुए निर्वाण लाडू समर्पित  करते हैं  और तीर्थंकरों से प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन ! एक दिन हमको भी अपने जैसा बना लेना.

शाम को घरों को सजाया जाता है और अंधेरा होने से पहले सोलह्करण के प्रतीक १६ दिए प्रज्ज्वलित किये जाते हैं और भगवान गौतम स्वामी की पूजा व आरती की जाती है.

जैनागम के अनुसार मुनिगण जैन श्रावकों को पटाखे ना चलाने एवं गरीब और असहाय लोंगों की सेवा करने एवं उनके घरों में रौशनी/ज्ञान के दिए जलाने का उपदेश देते हैं ताकि कोई भी घर अज्ञान और मिथ्यात्व के अँधेरे में ना रहे और चहुँओर अहिंसा धर्म की ज्योति प्रकशित होती रहे.

साधुओं का उपदेश है कि इस दिन जैन श्रावक केवल और केवल देव-शास्त्र और गुरु की आराधना ही करें एवं विशेष रूप से भगवान महावीर स्वामी एवं गणधर श्री गौतम स्वामी की पूजा करें, अन्धविश्वास में पड़कर धन-दौलत, रुपये-पैसे अथवा मकान-दूकान की पूजा ना करें.

पटाखे चलाने से लाखों जीवों का घाट होता है, उन्हें कष्ट पहुँचता है, गर्भवती नारी एवं गर्भस्थ शिशु, बीमार और वृद्धजनों को अत्यन्त कष्ट और परेशानियां सहनी पड़ती हैं, छोटे-जानवरों और पक्षियों की भी मौत हो जाती है.

Wednesday, September 5, 2012

Protest against blast of an ancient (1000 yr old) idol of Aadinath Jina at ALLUR (Karnataka)


हम जानते है कि रक्षाबंधन धरम की रक्षा का पर्व है, आपने कई बार सुना या पढ़ा ही होगा किस प्रकार 700 जैन मुनिराजो कि रक्षा हुई थी, आज फिर धर्म के लिए वैसा ही कुछ कर दिखाने का अवसर हमारे पास (सिर्फ हमारे पास) आया है-घटना इस प्रकार है- पिछले सप्ताह मोक्ष सप्तमी के दिन अलुर (जिला- गुलबर्गा – कर्नाटक) में कुछ समाजकंटको ने आदिनाथ प्रभु की १००० वर्ष प्राचीन जिन प्रतिमा बारूद से तोड़ दी- कई जगह धरने और प्रदर्शन हो रहे है, कर्णाटक में – किन्तु क्या हमें इस मामले में चुप रहना चाहिए- बिलकुल नहीं – आज जो अवसर आया है धर्म रक्षा का, रक्षाबंधन के इस शुभ पर्व पर – आइये हाथ से हाथ मिलाये..धर्म का साथ निभाए..नीचे पढ़े आपको क्या और किस प्रकार करना है |आपको कुछ नहीं करना है- बस ये नीचे लिखी इ-मेल नीचे दिए गए इ-मेल पतों पर भेजनी है – बस हो गया | एक एक करके नीचे लिखे पांचो ईमेल पतों पर भेज दे या फिर एक साथ भी भेज सकते है | और हा भेजने से पहले ईमेल में अपना नाम और शहर का नाम भी लिख दे ताकि उन्हें पता चले कि जैन हर जगह है और जागरूक भी है |
You can also sign online petition here- just click here login with FB id and it is done.

Fwd this email to everyone.
Draft of email:

Sir,It was really sad to hear/read the news of desecration of the 1000 years idol of Lord Adinatha (July 25, 2012 – on the holy day of Lord Parshwanath’s nirvan day) in front of the Jain Temple in Allur village of Chitapur taluk of Gulbarga district. We all are shocked-not only Jains but all who read it. After all it was a 1000 years old and very important heritage and also a remembrance of the great past of Rashtrakutas and Jainism.It is really shame on those miscreants who blasted the idol using dynamite. We request you personally and to the state government to arrest the miscreants and punish them and provide security to all Jain centers in the state, especially on such places like Allur where no or very less Jains reside.Please sir – do the needful as soon as possible- we are already belongs to minority religion- govt must secure our heritage and our minority rights.
Thanks,
YOUR Name and Address
इन पतों पर भेजना है –पुलिस अधीक्षक – गुलबर्गा- इ-मेल: sp-gulbarga@karnataka.gov.in Ph: 08472- 263602 / 263604 जिनके पास ईमेल नहीं है वो कृपया फ़ोन करे और अपना विरोध दर्ज कराये |
मुख्यमंत्री कर्नाटक- इ-मेल chiefminister@karnataka.gov.in
गृह मंत्री कर्नाटक – इ-मेल: min-home@karnataka.gov.in
कानून मंत्री – कर्नाटक इ-मेल: min-lawjushr@karnataka.gov.in
अल्पसंख्यक मंत्री- कर्नाटक इ-मेल: min-minortywelf@karnataka.gov.inआपका धन्यवाद् | 

Saturday, September 1, 2012

Vandalism of #JainIdols: Mega Protest Rally by Jains in Mumbai on Sunday 2nd Sept 2012


Entire Jain Samaj of Greater Mumbai is organising a Mega Protest Bike Rally on Sunday, 2nd Septmeber 2012 to protest against vandalism of idols of Lord Adinath and Lord Mahavira in Allur (Gulbarg-Karnataka) and Lucknow (U.P.).
This Bike rally will start at 8:30 am from SVP Ground, Pancholiya College, opp. Shri Munisuvrat Swami Jain Derasar, Bhulabhai Desai Marg, Kandiwali (West), Mumbai and will march from there to Malad, Goregaon, Jogeshwari, Andheri and will end at Mahatma Gandhi Smaarak, Juhu Chaupati, Mumbai. Thereafter Prominent Jainacharayas & Jain Munis including Ganivarya Acharya Shri Labdhichandrasagarji Maharaj, Muni Shri Devprabhsagarji Maharaj, Munishri Viragsagarji Maharaj, Munishri Vinamra Sagarji Maharaj will address the gathering at 11:30 am at Juhu Chaupati.
Organizers have informed to Ahimsa Sangh that this is historical rally in various ways because it is a coordinated effort of all the four sects of Jainism i.e. Digambar, Shwetambar, Terapanthi & Sthankavasi. 10000 Jains are expected to join this rally and 5000 vehicles will Chakkajam on SV Road.
Those who wants to join this movement can bring in their Cycle, Bike, Scooter or Car etc.
Ahimsa Sangh Requests all Jain Sanghs & Jain Trusts in Mumbai to publicize this event on grand level and ensure their Mandir’s/Trust’s representation in the rally.
Pl fwd this msg via sms/email or Facebook wall and occupy social media by talking on topic #JainIdols and #JainProtests and make it top trending subject.
Regards,
Editor, Ahimsa Sangh
Link to this news item pl click

Saturday, August 25, 2012

प्रतिमा का खंडन: दिल्ली में तीव्र विरोध प्रदर्शन



२३ अगस्त २०१२
नईदिल्ली। आज विश्व जैन संगठन के जुझारू और धर्मपरायण अध्यक्ष श्री संजय जैन की अगुवाई में दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पे लखनऊ में १७ अगस्त २०१२ को भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा तोड़े जाने के  विरोध में आयोजित विशाल धरना प्रदर्शन में हजारों की संख्या में जैन धर्मालंबियों ने उपस्थित होकर अपना तीव्र विरोध दर्ज करवाया। जंतर मंतर पर 7000 लोगों की उपस्थिति के बीच हमारी जैनशक्ति का विशाल स्वरुप देखने को मिला। इस विरोध सभा में दिगम्बर, श्वेताम्बर, तेरापंथी, स्थानकवासी जैन समाज ने एक साथ जैन एकता का परिचय दिया। इस धरने के साथ पूरे देश में लगभग 170 जगहों पर जैन समाज ने धरना दिया।
धरना प्रदर्शन के लिए सुबह से ही हजारों जैनों का हुजूम जंतर मंतर की तरफ बढ़ रहा था। लोगो के चेहररों पर उक्त घटना के प्रति आक्रोश साफ़ देखा जा सकता था। हजारो की संख्या एकत्र हुए लोगों में बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ भी सम्मिलित थी। युवा जैन हाथों में धर्मध्वजा थामे थे और जैन धर्म की जय’ ‘भगवान महावीर की जयकार’ ‘उत्तरप्रदेश सरकार हाय हाय’ के नारे लगा रहे थे।
धरने से पहले रोहणी के सेक्टर पांच में आयोजित धर्मसभा में श्रावकों को विश्वमैत्री दिवस के अवसर पर संबोधित करते मुनि श्री पुलक सागर जि महाराज ने कहा “जो धर्म के मार्ग पर चलता है वह तोड़ने में नहीं जोड़ने पर विश्वास रखता है। हमारे अंदर किसी धर्म विशेष से द्वेष की भावना नहीं है, पर हमारे धर्मायतनों पर हमला हमें असहनीय है, हमें तो सरकार की चुप्पी कचोटती है और ऐसा लगता है कि इस घटना के पीछे कोई राजनैतिक साजिश है जो देश की एकता को अखंडता को नष्ट करना चाहते है।
उन्होंने कहा कि मैं उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से पूछना चाहता हूँ कि अगर तुम्हारे पिता का हाथ टूटा होता तो क्या तुम चुप बैठते? नहीं ना!
लखनऊ में केवल पत्थर की मूर्ति नहीं अपितु हमारे पिता, हमारे जनक भगवान महावीर स्वामी जिनकी हम पूजा करते है उनकी मूर्ति को तोड़ने का दुस्साहस जालिमों ने किया है। उन्होंने कहा कि खंडित मूर्ति की जगह सरकार द्वारा दूसरी मूर्ति लगा देने की मांग नहीं करता, जैन समाज स्वयं इतना सक्षम है कि वह कई मूर्तियां स्थापित कर सकता है।
हमारी माँग है कि हमारे तीर्थो की, हमारी मूर्तियों की रक्षा होनी चाहिए। भविष्य मे इस प्रकार की घटनाएं दोबारा ना हो इस बात का आश्वासन हमें चाहिए। सरकार को कठोर कदम उठाकर दोषियों को गिरफ्तार कर दंड देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हम कोई अशांति नहीं फैलाएँगे, हम कोई हिंसा करने वाले नहीं, हम तो वो लोग हैं जब उठती है तो तलवार नहीं, करूणा की मयूर पिच्छी उठती है। लेकिन याद रखना कभी हमारे धर्मायतन पर आंच आती है तो हमारा समाज किसी के शीश नहीं काटता है अपितु अकलंक- निकलंक बनकर शीश कटाकर धर्म की रक्षा करता है। हमारी अहिंसा को कायरता ना समझा जाये। हमारी अहिंसा वीरो की अहिंसा होती है। उन्होंने कहा कि हमारा आंदोलन तब तक रहेगा जब तक सरकार कोई ना कोई आधिकारिक वक्तव्य जारी ना कर दे। पूरे हिन्दुस्तान की भावनाएं आहत हुई है।
उन्होंने कहा कि इस अवसर पर हम ऐसा कोई कार्य ना करे जिससे जैन समाज पर प्रश्न चिन्ह लग जाये लेकिन ऐसा कार्य भी ना करे कि मंदिर मूर्तियां लुटती रहे और हम घर मे बैठे रहे।  इस धरने का रूप बढ़ेगा और सरकार स्वयं आकर सम्पूर्ण जैन समाज से माफी मांगेगी। यह आवाज इस हाल में ही नहीं अपितु संसद व विधानसभा में  भी गूंजना चाहिए। आप सब अपने-२ राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल से मिलकर अपनी आवाज़ उठाइये, हर राज्य के अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत दर्ज करवाइए फिर देखिये कैसे परिणाम नहीं निकलता।
इसमें पधारने वाले कुछ अतिविशेष लोगों में केन्द्रीय राज्य मंत्री श्री प्रदीप जैन ‘आदित्य’, इस्लाम समाज के इमाम उमर अहमद इलियासी, अध्यक्ष-आल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन, ईसाई समाज के फादर डोमनिकजी, हिन्दू समाज के प्रज्ञानंद जी, सिख समाज से परमजीत सिंह जी, मुनि श्री नयपद्मसागर जी महाराज ससंघ एवं श्री लोकेश मुनि जी ससंघ शामिल थे, बहुत सारे गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित हुए।
इमाम उमर अहमद इलियासी ने कहा कि उप्र की राजधानी में दिन दहाड़े ५०० लोग इतना उत्पात मचाते रहे है और पुलिस ने कुछ नहीं किया। सरकार को कठोर कार्यवाही करनी होगी, मैं इस घटना की कड़ी निंदा करता हूँ।
श्री प्रदीप आदित्य ने कहा मेरा झांसी मे एक कार्यक्रम था लेकिन जैसे ही इस धरने के बारे मे पता चला तो मैंने सोचा कि धर्म सबसे पहले है इसके बाद कुछ और। मैं अपनी ओर से पूरा दबाव बनाऊंगा ताकि मामले में शीघ्र कार्यवाही हो।
उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ से एक सांसद को भी भेजा, उन्होंने नयी प्रतिमा स्थापित करवाने और दोषियों को पकड़ने की मुहिम चलाने का आश्वासन दिया. 
मुनि श्री नयपद्मसागर जी महाराज - मुझे समझ में नहीं आता कि शांतिप्रिय जैन समाज को इस देश में  निशाना क्यों बनाया जा रहा है। हमारे मंदिरों  व मूर्तियों को नुकसान क्यों पहुंचाया जा रहा है? आज हमें पंथवाद से ऊपर उठकर धर्म की रक्षा के लिए आगे आना होगा।
कार्यक्रम का सीधा प्रसारण पारस चैनल ने पूरे देश में दिखाया।
धरने में भारतवर्षीय श्री दिगम्बर जैन महासभा, अखिल भारतीय दिग. जैन परिषद, भारतीय जैन मिलन, अखिल भारतीय पुलक जन चेतना मंच, जैन महिला जागृति मंच, दिगम्बर जैन महासमिति, जैन मंच, पारस फांउडेशन, संस्कृति संरक्षण संस्थान, जैन युवा क्लब, पारस मंच, जैन शिक्षा समिति, विश्व ज्ञान भारती, रा। गौ रक्षा संगठन, जैन फाउन्डेशन एवं अन्य संस्थाओं का सहयोग प्राप्त हुआ।