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Wednesday, September 5, 2012

Protest against blast of an ancient (1000 yr old) idol of Aadinath Jina at ALLUR (Karnataka)


हम जानते है कि रक्षाबंधन धरम की रक्षा का पर्व है, आपने कई बार सुना या पढ़ा ही होगा किस प्रकार 700 जैन मुनिराजो कि रक्षा हुई थी, आज फिर धर्म के लिए वैसा ही कुछ कर दिखाने का अवसर हमारे पास (सिर्फ हमारे पास) आया है-घटना इस प्रकार है- पिछले सप्ताह मोक्ष सप्तमी के दिन अलुर (जिला- गुलबर्गा – कर्नाटक) में कुछ समाजकंटको ने आदिनाथ प्रभु की १००० वर्ष प्राचीन जिन प्रतिमा बारूद से तोड़ दी- कई जगह धरने और प्रदर्शन हो रहे है, कर्णाटक में – किन्तु क्या हमें इस मामले में चुप रहना चाहिए- बिलकुल नहीं – आज जो अवसर आया है धर्म रक्षा का, रक्षाबंधन के इस शुभ पर्व पर – आइये हाथ से हाथ मिलाये..धर्म का साथ निभाए..नीचे पढ़े आपको क्या और किस प्रकार करना है |आपको कुछ नहीं करना है- बस ये नीचे लिखी इ-मेल नीचे दिए गए इ-मेल पतों पर भेजनी है – बस हो गया | एक एक करके नीचे लिखे पांचो ईमेल पतों पर भेज दे या फिर एक साथ भी भेज सकते है | और हा भेजने से पहले ईमेल में अपना नाम और शहर का नाम भी लिख दे ताकि उन्हें पता चले कि जैन हर जगह है और जागरूक भी है |
You can also sign online petition here- just click here login with FB id and it is done.

Fwd this email to everyone.
Draft of email:

Sir,It was really sad to hear/read the news of desecration of the 1000 years idol of Lord Adinatha (July 25, 2012 – on the holy day of Lord Parshwanath’s nirvan day) in front of the Jain Temple in Allur village of Chitapur taluk of Gulbarga district. We all are shocked-not only Jains but all who read it. After all it was a 1000 years old and very important heritage and also a remembrance of the great past of Rashtrakutas and Jainism.It is really shame on those miscreants who blasted the idol using dynamite. We request you personally and to the state government to arrest the miscreants and punish them and provide security to all Jain centers in the state, especially on such places like Allur where no or very less Jains reside.Please sir – do the needful as soon as possible- we are already belongs to minority religion- govt must secure our heritage and our minority rights.
Thanks,
YOUR Name and Address
इन पतों पर भेजना है –पुलिस अधीक्षक – गुलबर्गा- इ-मेल: sp-gulbarga@karnataka.gov.in Ph: 08472- 263602 / 263604 जिनके पास ईमेल नहीं है वो कृपया फ़ोन करे और अपना विरोध दर्ज कराये |
मुख्यमंत्री कर्नाटक- इ-मेल chiefminister@karnataka.gov.in
गृह मंत्री कर्नाटक – इ-मेल: min-home@karnataka.gov.in
कानून मंत्री – कर्नाटक इ-मेल: min-lawjushr@karnataka.gov.in
अल्पसंख्यक मंत्री- कर्नाटक इ-मेल: min-minortywelf@karnataka.gov.inआपका धन्यवाद् | 

Monday, March 28, 2011

Know About Teerthankar Rishabhdev

प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभदेव जन्म्कल्यानक पर्व अथवा आम भाषा में  आदिनाथ  जयंती पर्व कहा जाता है, मनाया जाता है। इस दिन इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ था। वर्तमान अवसर्पिणी के तृतीय काल में चौदह मनु (कुलकर) हुए जिनमें चौदहवें मनु नाभिराय थे। इन्हीं नाभिराय और उनकी पत्नी मरूदेवि के चैत्र कृष्ण नवमी के दिन उत्तराषाढ नक्षत्र और ब्रह्म नामक महायोग में मति, श्रुत और अवधिज्ञान के धारक पुत्र का जन्म अयोध्या में हुआ था। इन्द्रों ने बालक का सुमेरु पर्वर पर अभिशेक महोत्सव करके ‘ऋषभ’ नाम रखा गया।
ऋषभदेव के अनेक नाम
ऋषभदेव के हिरण्यगर्भ, स्वयंभू, विधाता, प्रजापति, इश्वाक, पुरुदेव, वृषभदेव, आदिनाथ इत्यादि अनेक नाम पाये जाते हैं। महापुराण के अनुसार चूंकि उनके स्वर्गावतरण के समय माता ने वृषभ को देखा था, अतः वे वृषभ नाम से पुकारे गये। कल्पसूत्र में उपर्युक्त कारण के अतिरिक्त उनके उरुस्थल पर वृषभ का चिन्ह होने का कारण भी उल्लिखित किया है। भागवत पुराण के अनुसार उनके सुन्दर शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश और पराक्रम प्रभूति सद्गुणों के कारण महाराजा नाभि ने उनका ‘ऋषभ’ नाम रखा। वृषभदेव जगत भर में ज्येष्ठ हैं और जगत का हित करने वाले धर्म रूपी अमृत की वर्षा करेंगे, एतदर्थ ही इन्द्र ने उनका नाम ‘वृषभदेव’ रखा। वृष श्रेष्ठ को कहते है। भगवान श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हैं, इसलिये भी इन्द्र उन्हें ‘वृषभस्वामी’ के नाम से पुकारा। जब वे गभग में थे तभी हिरण्य (स्वर्ण) की वर्षा हुई थी, इसलिये देवों ने उन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा। वर्तमान जन्म से पूर्व तीसरे जन्म जो तीन ज्ञान प्रकट हुए थे उन्हीं के साथ वे उत्पन्न हुए इसलिये ‘स्वयम्भु’ कहे जाते हैं। उन्होंने भारत क्षेत्र में नाना प्रकार की व्यवस्थाएं की, अतः वे ‘विधाता’ कहे जाते हैं। वे सब ओर से प्रजा की रक्षा करते हुए ही प्रभु हुए, अतः ‘प्रजापति’ कहलाते हैं। उनके रहते हुए प्रजा ने इक्षु रस का आस्वादन किया, इस लिये उन्हे इक्ष्वाकु कहते हैं। वे समस्त पुराण पुरुषों में प्रथम थे, महिमा के धारक और महान थे तथा अतिशय देदीप्यमान थे अतः उन्हें ‘पुरुदेव’ कहते हैं। धर्म कर्म के आदिप्रवक्ता होने के कारण ऋषभदेव को आदिनाथ भी कहा जाता है।
गृहस्थ जीवन
ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे। जब वे युवा हुए तो नन्दा और सुनन्दा नामक कन्याओं के साथ उनका विवाह हुआ। नन्दा के भरत नामक चक्रवर्ती पुत्र और ब्रह्मी नामक पुत्री युगल रूप में उत्पन्न हुई। इन्हीं भरत ले नाम से इस देश का नाम भारत पडा।
भरत और ब्राह्मी के अतिरिक्त नन्दा रानी के वृषभसेन आदि अट्ठानवे पुत्र और हुए। सुनन्दा नामक दूसरी रानी के बाहुबली नामक पुत्र तथा अतिशय रूपवती सुन्दरी नामक पुत्री को जन्म दिया।
ऋषभदेव ने असि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और व्यापार इन छः विद्याओं का सूत्रपात किया। कृषि और उद्योग में अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। कर्मयोग की वह रसधारा बही कि उजडते और वीरान होते जन-जीवन में सब और नव वसंत खिल उठा, महक उठा। जनता ने उन्हें अपना स्वामी माना और धीरे-धीरे  बदलते हुए समय के अनुसार दण्ड-व्यवस्था, विवाह आदि समाज-व्यवस्था का निर्माण हुआ।

आज तीर्थंकर ऋषभदेव भगवान का जन्म कल्याणक दिवस है

In Jainism, Rishabh Dev (ऋषभदेव) or Adinatha (आदिनाथ) (other names used: Riṣhabh, Riṣhabhanāth, Rushabh, Rushabhdev, Adinath or Adishwar or Kesariyaji; Sanskrit ṛṣabha meaning "best, most excellent") was the first of the 24 Tirthankara. He belonged to the House of Ikshwaku, which was also known as the "House of the Sun".
According to Jain beliefs, Rishabha was the first Tirthankar of the present age (Avasarpini). Because of this, he had the name of Ādināth - the original lord.