Sunday, September 1, 2013

वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम २०१३ के अंतर्गत मयूरपंख से निर्मित पिच्छी के प्रयोग को प्रतिबन्ध से मुक्त रखने हेतु याचिका

दिनांक: ३१ अगस्त २०१३

प्रति,
श्री वीएसपी सिंह,
संयुक्त निदेशक, राज्यसभा सचिवालय,
कमरा संख्या: १४२, संसदीय सौध,
नयी दिल्ली – ११०००१
समिति का ईमेल है : rsc-st@sansad.nic.in

सन्दर्भ: ३१ अगस्त २०१३ के समाचार-पत्र में राज्यसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित विज्ञप्ति   

विषय: वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम २०१३

आदरणीय मान्यवर,

विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने देश के विभिन्न समाचार-पत्रों में प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित कर वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम २०१३ पर जनता के सुझाव और अभिमत, प्रतिक्रियाएं आमंत्रित किए जाने के संदर्भ मेंमैं सुझाव देता हूँ कि दिगंबर जैन साधुओं और साध्वियों द्वारा मयूर-पंख से निर्मित पिच्छी के उपयोग को उक्त विधेयक के प्रतिबंधों से पूर्णतः मुक्त रखा जाए एवं पिच्छी बनाने के लिए मयूर-पंख के प्रयोग को छूट दी जाए. 

जैनागम के अतिप्राचीन ग्रंथों में पिच्छी का महत्व बताते हुए कहा कि पिच्छी में मृदुता, सुकोमलता, अग्रहणता, तथा लघुता के गुण होते हैं। केन्द्र सरकार द्वारा पारित वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम २०१३ में मोर को कष्ट पहुँचाने एवं उसकी हत्या करने पर लगाया गया प्रतिबंध सर्वथा उचित है, परन्तु मोर द्वारा स्वाभाविक रूप से छोड़े गए पंखों पर प्रतिबंध लगाना कैसा न्याय है?

दिगंबर साधु की पहचान मोर पंख की पिच्छी है। पिच्छी मोर द्वारा अपने आप छोड़े गए पंखों से निर्मित की जाती है, मोरपंख को प्राप्त करने हेतु मोर को कोई कष्ट नहीं दिया जाता। दिगंबर साधु इसलिए मोर पंख का उपयोग करते हैं क्योंकि उसमें पाँच गुण हैं: मृदुता, कोमलता, निष्पृहता  अहिंसा और बाधा से रहित। मयूर पंख से निर्मित पिच्छी से दिगंबर मुनि सूक्ष्म और आँखों से दिखाई ना देने वाले जीवों की रक्षा करते हैं, जैनागम में इसे दिगंबर मुनियों के संयम का अनिवार्य उपकरण कहा गया है।  

सरकार द्वारा लाये गए इस अधिनियम से दिगंबर जैन मुनियों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न लग जाएगा, अहिंसा के विरुद्ध पारित हुए कानून कभी सफल नहीं हो सकते इसलिए सरकार से अनुग्रह है कि दिगंबरत्व के प्रतीक पिच्छी, कमंडल जो अहिंसा के उपकरण हैं उसकी सुरक्षा के लिए पुनः विचार किया जाए।

संत शिरोमणि दिगंबर जैनाचार्य श्री १०८ विद्यासागरजी महाराज ने केन्द्र सरकार द्वारा पारित अधिनियम पर कहा कि जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के समय से लेकर अब तक जितने भी साधु-साध्वियाँ हुई हैं उन सभी को कमंडल के साथ पिच्छी रखना अनिवार्य है। जैन धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ आचार्य श्री वट्टकेर द्वारा रचित मूलाचार एवं आचार्य श्री शिवकोटि रचित भगवती आराधना में भी उल्लेख है कि बिना पिच्छी के साधु सात कदम भी नहीं चल सकते। यह उनके समाधिमरण तक साथ रहती है। 

आचार्यश्री ने कहा कि केन्द्र सरकार का मयूर पिच्छी संबंधी प्रस्ताव दिगंबर जैन धर्म के साधुओं की आवश्यकताओं में बाधक है। सरकार को साधुओं की चर्या को ध्यान में रखते हुए जैन धर्म के हित में सकारात्मक निर्णय लेकर उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। साथ ही देश के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री को जैन धर्म की अनिवार्यताओं का ध्यान रखते हुए तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

मयूर पिच्छी ही क्यों ?

सकल संयम के धारी नवकोटि {समरंभ, समारंभ, आरम्भ, मन-वचन-काय, कृत-कारित-अनुमोदना} से सकल पापों के त्यागी, करुणानिधान, ज्ञानध्यान तप में लीन आत्मध्यानी दिगंबर जैन मुनिराज जब आत्मध्यान से बाहर आते हैं तो उन्हें भी २८ मूल गुण रूप शुभ भाव एवं शुभाचार होता है। उसमें  स्वाध्याय, सामायिक, आहार, विहार, निहार, शयनादि रूप प्रवृत्ति भी स्वभाविक रूप से होती ही है।।

अतः यदि ये क्रियाएं विवेक और सावधानी पूर्वक संपन्न नहीं की जावेगी तो इनमें  जीव हिंसा अवश्य ही होती है। संयम मुनिधर्म का प्राण है, अतः मुनिधर्म के पालन हेतु मुनिराज का अभिप्राय, परिणाम एवं प्रवृत्ति ऐसी होती है कि वे एकेंद्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यंत सभी जीवों की द्रव्य व भाव हिंसा में निमित्त भी नहीं बनते। 

अतः जिन प्रवृत्तियों में हिंसा संभव है उनसे स्वयं बचने के लिए आवश्यक है कि उनके संयम का उपकरण [अर्थात पिच्छी] ऐसा होना चाहिए जिससे किसी भी प्रकार से किसी भी जीव की हिंसा नहीं हो अथवा सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा हो, उसे कष्ट ना पहुँचे ।

मुनिधर्म के प्ररूपक जैन ग्रन्थ श्री मूलाचार एवं आराधना आदि ग्रंथों में सर्वगुण सम्पन्न एवं सर्व दोष रहित पिच्छी के स्वरूप का वर्णन करते हुए आचार्यों ने लिखा है कि --"हे मुने! तुम्हारे संयम की रक्षा करने वाला संयम का उपकरण प्रतिलेखन [पिच्छी] है । वह शोधनोपकरण पिच्छिका तुम्हारे पास प्रति समय (अर्थात सदैव) रहना चाहिए।"

दिगंबर जैन मुनि की प्रतिज्ञा सभी जीवों पर दया करना एवं उनकी रक्षा करना है, इसलिए पिच्छी उसकी पहचान है यह मनुष्यों और पशु-पक्षियों को भी  विश्वास दिलाती है कि जो दिगंबर मुनिराज सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए इतने सजग एवं करुणावान हैं वे अन्य जीवों के प्रति भी उतने की करुणामय होते हैं। 

जिसमें निम्नलिखित पांच गुण पाए जाएँ वही प्रतिलेखन प्रशंसनीय माना जाता है:
१-     रजो-अग्रहण (धूल को ग्रहण ना करना);
२-     स्वेद-अग्रहण (पसीने को ग्रहण ना करना);
३-     मृदुता (कोमलता);
४-     सुकुमारता (सुंदरता);
५-     लघुता (कम भार)।

रजो-अग्रहण गुण   :-
मुनिराज के ज्ञान का उपकरण शास्त्र है उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अलमारी, अछावर आदि साधन परिग्रह होने से मुनिराज उन्हें नहीं रखते अतः शास्त्र खुले स्थान में उच्च स्थान में रखे रहते हैं जिससे उनपर धूल आदि चढ़ जाती है और साथ ही सूक्ष्म जीव भी उसमें छिप जाते हैं या चिपक जाते हैं। अतः स्वध्याय हेतु मुनिराज जब भी शास्त्र का उपयोग करते हैं तो नेत्रों से भली-भांति देखकर एवं पिच्छी से सावधानी से परिमार्जन करते हैं । 

जिस स्थान या बसतिका में निवास करते हैं तथा जिस काष्ठासन आदि पर बैठते हैं वे भी खुले स्थान में होते हैं, उन पर भी सूक्ष्म तथा स्थूल जीव चढ़ जाते हैं अतः उन पर बैठने, उठने, शयन करने में, हाथ पैर फैलाने, सुकोड़ने, करवट आदि बदलने के पहले उन स्थानों, आसनों एवं शरीर को पिच्छी से परिमार्जित अर्थात साफ़ करते हैं।

दिगंबर जैन मुनि जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करने के बाद से आजीवन पग-विहार ही करते हैं, किसी भी प्रकार का वाहन कभी भी नहीं करते, वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल विहार में गमनादि करते समय चार हाथ आगे की भूमि देखकर मध्यम गति से तो गमन करते ही हैं परन्तु जिस भूमि पर गमन करते हैं, उस भूमि की मिट्टी के कण मुनिराज के शरीर पर लग जाते हैं, साथ में एक तरह की मिट्टी में जो सूक्ष्म जीव रहते हैं वे जीव दूसरी तरह की मिट्टी  में जीवित नहीं रह पाते हैं।अतः जब मुनिराज विहार करते हुए एक तरह की मिट्टी वाली भूमि से दूसरी तरह की मिट्टी  वाली भूमि में गमन के पूर्व वहीं खड़े होकर शरीर का पिच्छी से परिमार्जन करते हैं ।

इसी प्रकार छाया से धूप में तथा धूप से छाया वाले छेत्र में विहार के पूर्व ही खड़े होकर शरीर  का परिमार्जन करते हैं। यदि ऐसा न करेंगे तो धूप के जंतु छाया के संसर्ग से तथा छाया के जंतु धूप के संसर्ग से मर जाएँगे और इस अविवेक का दोष मुनिराज को लगेगा तो ईर्या समिति निर्दोष नहीं पल पायेगी।

जिस प्रकार शास्त्र, आसन, बस्तिका की धूल का परिमार्जन करते हैं वैसे ही शौच का उपकरण कमंडलु है उस पर भी धूल आदि चढ़ जाती है अतः उसे भी उपयोग करने के पूर्व उसका परिमार्जन करते जिससे आदान-निक्षेपण समिति भली – भांति पल जाती है।

मुनिराज जिस स्थान पर मल-मूत्र-थूक आदि क्षेपण करते हैं वह स्थान प्रासुक, शुष्क एवं जीव जंतुओं से रहित होना चाहिए, फिर भी नेत्रों से भली-भांति देखने पर भी धूल आदि में सूक्ष्म जीवों की सम्भावना हो सकती है अतः उक्त कार्य करने के पूर्व उस स्थान का पिच्छी से परिमार्जन करते हैं अतः प्रतिष्ठापन समिति निर्दोष पल जाती है। 

उपर्युक्त सभी क्रियाओं अथवा गतिविधियों को करने में धूल आदि का जिस पिच्छी से परिमार्जन  किया जा रहा है उसमें  ऐसा गुण होना चाहिए कि वह धूल से मैली नहीं होना चाहिए, यदि धूल से मैली होने वाली हो तो उसमें जीवों की उत्पत्ति होने लगेगी और वह हिंसा का आयतन बन जाएगी । ऐसा होने पर अहिंसा महाव्रत खंडित हो जाने से मुनि धर्म ही नष्ट हो जायेगा, परन्तु  मयूर पिच्छी ऐसी होती है कि उससे कितनी भी धूल का परिमार्जन किया जाये वह किंचित मात्र भी मैली नहीं होती अतः रजो अग्रहण गुण की धारक मयूर पिच्छिका ही होती है । 

स्वेद अग्रहण गुण :-  
एक स्थान से दूसरे स्थान की और पैदल विहार करते समय मुनिराज के शरीर से पसीना आना तथा उस पर धूल आदि लग जाना स्वाभाविक ही है, अतः मुनिराज जब धूप से छाया में और छाया से धूप में गमन करते हैं तो पिच्छी से शरीर का परिमार्जन करते हैं, ताकि धूप तथा छाया के सूक्ष्म जीव जो शरीर पर लग गए वे अन्यत्र वातावरण में पहुंचकर मर ना जाएँ, अतः पसीना के परिमार्जन से पिच्छी गीली न हो, ऐसा गुण पिच्छी में होना चाहिए, यदि पसीने से पिच्छी गीली हो जाए तो उसमें धूल आदि के संपर्क में आने से सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति हो जाएगी तब फिर वही पिच्छी हिंसा का आयतन बन जाने से अहिंसा महाव्रत के पालन के सर्वथा अयोग्य हो जाएगी । तब  फिर पुनः पुनः नवीन पिच्छी की आवश्यकता पड़ेगी और सम्पूर्ण परिग्रह के त्यागी मुनिराज के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकेगी, अतः महाव्रत खंडित होने से मुनि धर्म नष्ट हो जाएगा ।

परन्तु मयूरपंख से बनी पिच्छी में ऐसा गुण है कि पसीने से वह बिलकुल गीली नहीं होती तथा धूल आदि को भी ग्रहण नहीं करती। अतः पुनः -पुनः धूल एवं पसीने का परिमार्जन करने पर भी उसमें जीवों की उत्पत्ति नहीं होती, अतः अहिंसा महाव्रत सहज ही पल जाता है। अतः स्वेद अग्रहण स्वभाव वाली होने से मयूर पिच्छी ही मुनि धर्म पालन में सहायक है।

मृदुता गुण :-  
एक -दो इन्द्रिय आदि जीवों का शरीर  इतना सुकोमल होता है कि यदि किसी कठोर पिच्छी से परिमार्जन  किया जायेगा तो उनका मरण हो जाने से अहिंसा महाव्रत नष्ट हो जायेगा , अतः पिच्छी ऐसी   होनी चाहिए कि सुकोमल तथा सूक्छ्म अवगाहना वाले जीवों को भी परिमार्जन  के काल में कोई कष्ट न हो और न ही उनकी द्रव्य या भाव प्राणों कि हिंसा हो ।
मयूर पिच्छी इतनी कोमल होती है कि कि उसका अग्र भाग आँख में चले जाने पर भी आँख को कोई कष्ट नहीं होता, अतः मृदुता अर्थात कोमलता गुण कि धारी मयूर पिच्छी ही सर्व प्रकार के सर्व जीवों को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुँचाने में समर्थ होने से अहिंसा महाव्रत के पालन के लिए सर्वदा एवं सर्वत्र उपयुक्त है तथा उपादेय है । 

सुकुमारता /प्रियदर्शनीयता गुण:-
उपरोक्त गुणों के साथ पिच्छी में नेत्रों को मनोहर लगने वाला प्रियदर्शनीय गुण भी आवश्यक है । क्योंकि जो श्रावक भक्त आदि उनके निकट आते हैं उन्हें यह संयम का उपकरण प्रिय लगे और भोले जीव भी उससे आकर्षित होकर मुनिराज के निकट आवे यह गुण मयूर पिच्छी में स्वभावतः ही है। 

लघुता गुण :- 
मुनिराज को अपनी प्रत्येक क्रिया के समय पिच्छी की आवश्यकता होती है अतः मुनि दीक्षा अंगीकार करते समय से ही पिच्छी को जीवन पर्यंत साथ रखना अनिवार्य होता है। इसके लिए आवश्यक है कि पिच्छी इतनी हल्की होनी चाहिए कि उसे बाल, वृद्ध, रोगी, क्लांत, समाधि साधक, जीर्ण शरीर एवं बल वाले सभी मुनिराज आसानी से उसे उठाकर अपना परिमार्जन कार्य कर सकें। साथ ही यदि पिच्छी के नीचे कोई जीव दब जावे तो उसके वजन से उसको कोई कष्ट न हो, इस दृष्टि से भी देखा जाए तो मयूर पिच्छी इतनी हल्की होती है कि जिससे सूक्ष्म जंतु के शरीर को भी किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती तथा अत्यंत वृद्ध एवं अशक्त मुनिराज को भी उसे उठाने में कष्ट नहीं होता तथा उनके शरीर का परिमार्जन करने पर भी उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता।

इस प्रकार प्रतिलेखन अर्थात पिच्छी के सम्पूर्ण गुण जैसे रजोअग्रहण, स्वेदअग्रहण, मृदुता [कोमलता], प्रियदर्शनीयता और लघुता गुण से परिपूर्ण मात्र मयूरपंख से निर्मित पिच्छी ही होती है, जिसके द्वारा जीव हिंसा किसी भी प्रकार नहीं होती अतः महाव्रतों के धारी मुनिराज के संयम धर्म के पालन में यही मयूर पिच्छी अनिवार्य है। 

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए एवं दिगंबर मुनियों की सहस्राब्दियों पुरातन परम्परा का ध्यान रखते हुए हम समिति से विनम्र अनुरोध करते हैं कि दिगंबर मुनियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली पिच्छिका बनाने के मयूरपंख के इस्तेमाल को वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम २०१३ के प्रावधानों से मुक्त रखा जाए ताकि विश्व के सर्वाधिक प्राचीनतम जैन धर्म की दिगम्बर मुनि परंपरा अक्षुण्ण बनी रहे।

हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि भारत सरकार दिगम्बर मुनियों के प्रति सम्मान भाव रखते हुए पिच्छी निर्माण के लिए मयूरपंख के उपयोग को प्रतिबंधों से अलग रखेगी और उक्त अधिनियम को अधिसूचित करने से पहले आवश्यक संशोधन किया जाएगा ।

धन्यवाद सहित,


भवनिष्ठ,

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दूरभाष/चलभाष :
ईमेल: 

Friday, July 19, 2013

Shyam Rudra Pathak

Scholar alleges harassment
NEW DELHI, July 5 (UNI) — An outstanding research scholar has complained to the National Human Rights Commission (NHRC) alleging harassment and victimisation by the authorities of the National Centre for Radio Astrophysics (NCRA), Pune, for his crusade against corruption in the institute.
According to the complaint to the NHRC, the scientist, Mr Shyam Rudra Pathak, was facing complete ruination of his career and personality because of the continuous persecution and victimisation by the authorities of the NCRA.
Mr Pathak, an M.S. (physics) and M. Tech from the IIT Delhi, had topped the list of successful candidates in the written examination of the research scholars’ selection test of the prestigious Tata Institute of Fundamental Research (TIFR), in 1993, conducted jointly by the NCRA and the Inter University Centre for Astronomy and Astrophysics.
The complaint stated that a few months after successfully completing the course work for one semester in the TIFR Mr Pathak was transferred to the NCRA, which was a branch of the TIFR, on August 19, 1991.
Although he was called to join the course work in the NCRA after a delay of about two weeks from the beginning of the graduate programme, his performance was better than all other research scholars of his batch.
However, after completing his graduate programme, Mr Pathak was terminated in a highly arbitrary and oppressive manner without any reason. Though the termination was later revoked, he had to waste two years because of this arbitrary decision of the NCRA.
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But this was not the end of his victimisation. He got registered for Ph.D in Pune University on January 18, 1995, following the withdrawal of his termination order. But before he could complete his research work Mr Pathak was again informed that his fellowship in the NCRA, Pune was withdrawn with effect from July 31, 1997.
The complaint stated that like the previous occasion, this time Mr Pathak was not given any formal termination order, but his research facilities were withdrawn and he was told to go away from the institute.
Generally the research scholars who finished their Ph.D in the NCRA are given fellowship for about six years or more for the research work, but he got less than three years because of his “tyrannical termination” earlier.
Mr Pathak wrote to the authorities that he would not cooperate with their order and continued to go to his office room.
However, on January 19, 1998, he was stopped from entering his office room. But he did not go back and started “satyagraha” there itself to express his non-cooperation with the “unjust order”. But the next day he was taken away by the police.
Following this his wife, Dr Manju Pathak, was beaten grievously and insulted and taken to the police station. The couple were later sent to the police lock-up, where they had to face the insulting behaviour and abusive language of the police, the complaint stated. 
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The brilliant scholar, who had topped the list of the GATE-1985 examination with a score of 99.89 per cent and awarded junior fellowship of the CSIR and senior fellowship of the IIT, Delhi earlier, was handcuffed while being taken from the lock-up to the court.
The complaint stated that while the couple were in the lock-up, their three children aged 10, 7 and 4 were shifted from their hostel room and all their belongings taken away from the room by the institute authorities.
When the couple were freed on the night of January 21, 1998, after a court order, they were not allowed to enter the NCRA campus by the security guards. Even their three children, who were shifted to another room of the hostel, were brought from the hostel uo to the campus gate and were handed over to them by the security guards.
They were not given any money or personal belongings even though he talked to the Dean and the Director of the centre about it on phone from outside the campus. Since then, they were forced to live a life of extreme deprivation.
Although Mr Pathak and his wife wrote to the Director, TIFR and the chairman of the TIFR Council of Management and from March 10 to 12, 1998, his wife sat on a dharna in front of the TIFR campus. There was no response from the authorities.
The complainant also wrote a letter to the Prime Minister on April 13 this year, but no action was taken. Ultimately, he approached the NHRC.

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Tuesday, April 30, 2013

दिगंबर जैन मुनि श्री निर्भय सागर जी महाराज से अभद्रता और मारपीट


आगरा। २९ अप्रैल २०१३. दिगंबर जैन मुनि श्री निर्भय सागर जी महाराज से अभद्रता और मारपीट पर आगरा के एत्‍मादपुर कस्‍बे में साम्‍प्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया। सैंकड़ों लोग एक दूसरे पर भिड़ गए। राष्ट्रिय राजमार्ग 2 अराजकता का अखाड़ा बन गया।

आक्रोशित लोगों ने एक दर्जन से अधिक बसें तोड़ दी। राज्य परिवहन की एक बस में आग लगा दी। पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो भगदड़ मच गई। आठ लोग बुरी तरह घायल हो गए। रात साढ़े सात बजे से 12 बजे तक राजमार्ग 2 पूरी तरह जाम रहा। आगरा - कानपुर के बीच आवागमन ठप हो गया। रात को पुलिस कड़ाई से पेश आई और तब माहौल शांत हुआ।

घटना की शुरुआत शाम करीब सात बजे आगरा से 20 किलोमीटर दूर एत्‍मादपुर इलाके में हुई। दिगंबर जैन मुनि निर्भय सागर बरहन से पैदल विहार कर संघ के साथ एत्‍मादपुर आ रहे थे। ऊंट वाले मौहल्ले के पास सुतुरवान बस्ती में एक दुकान पर बैठे एक सम्‍प्रदाय विशेष (मुसलमान) के कुछ युवकों ने छींटाकशी की। मुनि के साथ चल रहे लोगों ने विरोध किया। इसके बाद इस पर युवक भड़क गए। मुनि और संघ से खींचतान और मारपीट की। हमले में संजय जैनयशू जैनविनय जैन और अजय जैन घायल हो गए। मुनि और यात्रा में शामिल लोगों ने दौड़कर मौहल्ला जैनगंज में जाकर जान बचाई।

यह खबर शाम साढ़े आठ बजे तक आग की तरह आगरा और फिरोजाबाद जिले में फैल गई। आक्रोशित लोग मुनि महाराज के समर्थन में एत्‍मादपुर पहुंच गए। लेकिन यहां पहले से मौजूद अराजकतत्‍वों (मुस्लिमों) ने उनकी पिटाई कर दी। इसके बाद देखते ही देखते जैन समाज के सैंकड़ों लोग पहुंच गए। अब माहौल साम्‍प्रदायिक तनाव और दंगे में बदल गया। दोनों तरफ से मोर्चाबंदी हो गई। पत्‍थरबाजी के बाद यहां पुलिस पहुंची।






अराजक तत्‍वों ने पुलिस के साथ भी हाथापाई की। इसके बाद पुलिस पीछे लौट गई। अब आक्रोशित जैन समाज के लोग राजमार्ग 2 पर पहुंच गए। रात करीब साढ़े आठ बजे थाने को घेर लिया। इसके बाद आगरा-कानपुर राजमार्ग जाम  हो गया। गुस्‍साए लोगों ने कासगंज डिपो की एक रोडवेज बस घेर ली। बस में चीख-पुकार मच गई। सवारियां उतर कर भागीं। उग्र भीड़ ने फिर खाली रोडवेज बस को आग के हवाले कर दिया। इसके बाद कई थानों की फोर्स आलाधिकारी के साथ यहां पहुंची।

तब तक करीब एक दर्जन बसों में तोड़-फोड़ की जा चुकी थी। यात्री जानबचाकर भाग रहे थे। पुलिस ने लाठीचार्ज करके आक्रोशित भीड़ तितर-बितर किया और हालात पर काबू पाया। राजमार्ग पर एक ओर टूंडला तक और दूसरी ओर रामबाग तक वाहनों की कतारें लगी हुई थीं।

एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने बताया कि जैन मुनि के साथ अभद्रतामारपीट करने वाले और बाद में उपद्रवियों को पकड़ने की कार्रवाई चल रही है। ऐसे लोगों पर राष्‍ट्रीय सुरक्षा कानून के तरह कार्रवाई होगी।

Monday, April 8, 2013

गुजरात में गिरनार की यात्रा करने वाले जैन तीर्थ यात्रियों पर बढ़ते निरंतर अत्याचार, पाँचवीं टोंक पर आने वाले जैनों से मार-पीट और गली-गलौच, जान से मारने की धमकी


गुजरात में गिरनार की यात्रा करने वाले जैन तीर्थ यात्रियों पर बढ़ते निरंतर अत्याचार, पाँचवीं टोंक पर आने वाले जैनों से मार-पीट और गली-गलौच, जान से मारने की धमकी

क्या यही है “कुछ दिन तो गुजारो, गुजरात में” का नारा

२७ मार्च २०१३
हृदय कम्पित कर देने वाला वाक्या फिर हुआ गिरनार वंदना के दौरान - जरुर पढ़े

455 लोगों ने की इस होली पर जैनधर्म के २२वें तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान् की मोक्षस्थली गिरनार पर्वत की यात्रा की जिसमें  महिलाए, बच्चे, किशोर बालक तथा बालिकाए सभी शामिल थे !

चौथी तथा पांचवी टोंक पर हमारे कुछ साथियों  को उकसाया गया, उसको भद्दी गलिय दी गयी, उनको बंधक बनाया गया, कथाकथित महंत/पंडो द्वारा पीटा गया, जिसका पूरा सपोर्ट दिया ड्यूटी पर तैनात पुलिस वाले, तथा उस पुलिस वाले ने भी डंडे मारे और दोनों पक्षों को सुने बिना हमें जिम्मेदार मानकर हमारे साथियों को भद्दी गालियाँ  दी [ जिसकी हमारे पास फोटो और नाम दोनों है ] !! --- ये रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया पढ़े और जाने कि गिरनार पर्वत पर धर्म की आड़ में गुंडागर्दी और आतंक का वातावरण बनाया गया है !!

क्यों शांतिप्रिय जैनों पर अत्याचार किए जा रहे हैं और सरकार चुप है ?

हम सब लोग 29 मार्च २०१३ को शाम तक गिरनार जी जूनागढ़ पहुँचे जहाँ  आचार्य श्री निर्मलसागर जी महाराज सासंघ के दर्शन किये तथा उनसे अगले दिन यात्रा करने का आशीर्वाद लिया, महाराज जी बताया की पहाड़ पर एक कम 10,000 सीढ़ियाँ  है और कहा की शांति से यात्रा करना तथा तीसरी और पांचवी टोंक पर णमोकार मंत्र, नेमिनाथ भगवान् की जय, या जाप आदि कुछ नहीं करना, ना ही चावल, बादाम आदि कुछ नहीं चढ़ाना, बस शांति से जाना इन दोनों टोंक पर, और पहली टोंक पर अपना मंदिर है वहा अच्छे से दर्शन करो पूजा अभिषेक सब करना तो हम सबने निर्णय लिया की हमें ये सब पूरी तरह से फॉलो करना है और अगर वे उकसाए तो भी शांति से सहन करना क्योकि हम दर्शन करने आये शांति से तथा हमें विवाद में नहीं पड़ना इसलिए हम इन टोंक पर समूह में जायेंगे तो शांति से दर्शन करके आ जायेंगे !


सामान्तः हम जैन लोगों में सफ़ेद वस्त्र पवित्रता और शांति का प्रतिक माना जाता है तथा हम बड़ी विशेष यात्रा सफ़ेद वस्त्र जैसे कुरता पाजामा आदि पहनकर ही यात्रा करते है, गिरनार यात्रा के लिए भी 455 में से अधिकतर लोगों ने सफ़ेद कुरता पाजामा, कमीज आदि ही पहनी और सुबह लगभग 3 बजे सबने पहाड़ पर चढ़ना शुरू किया, जब हम सबने पहाड़ पर चलना शुरू किया तो हम लोग उत्सुक थे कि  नेमिनाथ भगवान् ने यहाँ तप करके मोक्ष प्राप्त किया, राजुल ने यही तप किया तथा और भी अनेक विशेष कथाये इस पर्वत से जुडी है!

सबसे पहले हम लोग पांचवी टोंक की और जा रहे थे, तब सबने कहा की हमें समूह में जाना है क्योकि कुछ महिलाए बच्चे आदि डर रहे थे क्योकि गिरनार पर प्रबलसागर जी महाराज पर हुए हमले के बारे में सबने सुना था, जैसे की आप जानते होंगे पांचवी टोंक पर बहुत ज्यादा जगह नहीं है तो एक साथ में लगभग 10-12 लोग ही जा सकते है तो सबने थोडा थोडा दर्शन करना शुरू किया और लोग निकलते जा रहे थे, और लोग लाइन से दर्शन कर रहे थे, जब हमारा नंबर आया जिसमें  अमित मोदी [गुडगाँव], चन्द्र प्रकाश मित्तल [गुडगाँव], निपुण जैन [दिल्ली], सन्मति जैन [जापान] आदि लोग शामिल थे, वह पर बैठा हुआ महंत लगातार चिल्ला रहा था 'जल्दी जल्दी निकल यहाँ से, शांनापंती नहीं दिखाने का' और वो घुर घुर कर सबको डरा रहा था, लगा मानो हम अपराधी है और सजा पाने आये है वहा, तब जैसे की सभी एक राउंड लगाते है चरण के चारो और ऐसे हमने भी राउंड लगान शुरू किया तब हमारे संघ संचालक चन्द्र प्रकाश मित्तल जी ने ढोंक दी तो पांडा बोला 'ढोंक नहीं देने का' और वो एकदम खड़ा हो गया और अमित मोदी जी को एक डंडा बहुत जोर से मारा [उस महंत के पास बहुत मोटा डंडा था, ] हम समझ ही पाते की दूसरा डंडा चन्द्र प्रकाश मित्तल जी को जैसे ही मारना चाहा तो उन्होंने जैसे ही अपने बचाव में अपना हाथ आगे किया तो डंडा सीधा उनके हाथ में आगया तो उन्होंने डंडा लेकर फेक दिया [ हम चाहते तो उस समय कुछ भी कर सकते थे, सब जवान थे, युवा थे, पर हम विवाद करने नहीं बल्कि शांति से दर्शन करने गए थे] तो फिर डंडा को साइड में फेका तो वो महंत को पता नि क्या हुआ वो बहुत बुरी बुरी गालियाँ  देने लगा और बोलने लगा अभी शंख फूंकता हूँ, और उसने एकदम बार बार शंख बजाना शुरू कर दिया और शोर मचाने लगा की कुरता पाजामा वालो को पकड़ो तब पांचवी टोंक के आस पास की महिलाय डर गयी और उस समय वहा एक भगदड़ सी का वातावरण  बन गया तथा बच्चे रोने लगे ! ये सब एकदम अचानक से हुआ हम सब लोग हक्के बक्के थे की हमने तो कुछ नि किया फिर ये ऐसा आतंक का वातावरण  क्यों बनाया और डंडा क्यों मारा !

फिर हम सब युवाओ और पुरुष वर्ग ने वहा पर शांति बनाने की कोशिश की तथा भगदड़ के वातावरण  को शांत करने की कोशिश की और फिर वातावरण शांत हो गया, तब फिर हम लोगों ने चौथी टोंक पर चढ़ना शुरू किया जो की कच्चा और खड़ा पहाड़ का रास्ता है, उस पर सब लोग चढ़ रहे थे बच्चे महिलाए सब शामिल थे, और मैं [निपुण जैन, दिल्ली] तथा भाई साधर्मी सन्मति जैन, जापान - हम दोनों साथ में चढ़ रहे थे और हम दोनों लगभग 75% पहाड़ को पार कर चुके थे तथा बहुत ऊंचाई पर थे, तभी एक शोर आया तो देखा निचे कुछ पण्डे खड़े है जिनके हाथो में मोटे मोटे पत्थर है जो बोल रहे थे 'यही है सफ़ेद कपडे वाले दोनों' 'इन दोनों को पकड़ो' और उन्होंने कहा 'निचे उतरता है या वही पत्थर मारू' साथ में पुलिस वह भी यही कह रहा था और इतनी गन्दी गालियाँ  दे रहा था पुलिस वाला और वो पण्डे की मैं यहाँ उन गलियों के शब्दों को नहीं कह सकता, अचानक ऐसा वातावरण  बनाने पर सब लोग हम घबरा गए की पता नि क्या हुआ जो ऐसे हमें बुला रहे है, और जल्दी जल्दी उतरने के लिए वे बोलने की नहीं तो पत्थर मरता हूँ और साथ में पुलिस वाला ऊपर  से मानसिक प्रताड़ना दे  रहा था, तब हमने जल्दी जल्दी उतरना शुरू किया, कुछ महिलाए तो विशेष रूप से घबरा गयी थी, और बच्चे रोने लगे थे और बड़े ही सहम गए थे तब हम जल्दी जल्दी उतरने के चक्कर में मैं [निपुण जैन ] और एक छोटा बच्चा, हम दोनों ऊंचाई से एकदम फिसल कर गिर पड़े, गिरते ही पुलिस वाले ने सन्मति जैन और मुझे पकड़ लिया और मुझे [निपुण जैन] दो डंडे मेरे पीछे बहुत तेज तेज मारे जिसका दर्द आज सात दिन निकाल जाने के बाद भी हल्का हल्का मुझे है !

फिर पण्डे और पुलिस वाला बोलना लगा इन दोनों को आश्रम में ले चलो [पंडो का रहने का स्थान जो की पांचवी टोंक और चौथी टोंक के बीच में एक साइड में रास्ता जाता है वह पर है ] और वे 4-5 पण्डे और पुलिस वाला हम दोनों [निपुण और सन्मति] को पकड़ कर आश्रम में ले गए, वह लगभग 7-8 पण्डे थे एक सबके हाथो में बहुत मोटे मोटे डंडे थे और दिखने में बड़े ही भयानक लगते थे, एक बोल रहा था इन दोनों को यही से निचे फेक को, कोई कहता था इनकी हड्डी तोड़ दो, कोई कहता था इनको अन्दर ले चलो हम अभी बताते है इनको ठीक, तो एक बोल रहा था इनको ब्लेड करो हाथो पैरो में वैसे भी आत्मा तो अमर है तब इनको दर्द होगा और आश्चर्य था की पुलिस वाला उन पंडो का साथ दे रहा था और लगातार गालियाँ  दे रहा था, और बोल रहा था की एफआईआर  होगी तुम दोनों के ऊपर , तो हमने बोल हमने किया क्या है ये तो पता चले, वो समय मेरे जीवन में सबसे भयभीत कर देनेवाला समय था, और एक पल के लिए लगा मानो प्रबल्सागर जी से भी भयानक हम दोनों के साथ आज होने वाला है, जब भाव आया की आत्मा अजर अमर है अगर हमें कुछ होता भी है तो हम शांति से सहन करेंगे, ये नेमिनाथ भगवन की मोक्ष भूमि है हमारी गति शांति भावो से सही होगी !


वो पुलिस वाला बार बार बोलता था तुम दोनों ने महंत की लकड़ी कहा फेक दी ? तो हमने कहा हमें किसी लकड़ी का नहीं पता और हमने कोई लकड़ी नहीं फेकी, इस तरह बार बार वो बोलता था कि स्वीकार  करलो कि  तुमने महंत की लकड़ी फेंकी है तब हम भी बार बार कह रहे थे जो काम हमने किया ही नहीं उसको कैसे मान ले ? तब वो बोल की चलो अभी पांचवी टोंक पर लेकर चलता हूँ तुम दोनों को और महंत से पुछवाता हूँ और अगर महंत ने तुमको पहचाना तो फिर तुम दोनों की खैर नहीं आश्रम में लेकर तुमको इतना मारूंगा की आना भूल जाओगे यहाँ तब वो हमको फिर पांचवी टोंक पर लेकर गया हम लोग बहुत ज्यादा थके हुए थे ऊपर  से सब मानसिक शोषण हो रहा था तब ऊपर  से फिर पांचवी टोंक पर जाना बहुत भयभीत करदेने वाला समय था हमारे लिए लेकिन हम शांति से सब सहन करते हुए चल रहे थे वो पुलिस वाला हमें एक सेकंड के लिए भी रुकने नहीं देता था और बोलता था चलते रहो जबकि हमारी साँस भी फुल रही थी क्योकि गर्मी भी बहुत थी और हमें इतनी आदत भी नहीं की इतना चले वो भी ऐसी परिस्थिति में चलना, तब हम पांचवी टोंक पर पहुँचे  तो उस पुलिस वाले ने महंत से पूछा की ये दोनों ही थे क्या लकड़ी फेकने वाले ? तो महंत ने कहा ये दोनों ने नहीं थे पर इनके साथी थे, और हम दोनों को बोला 'तुम लोगों को निचे से जहर देकर ऊपर  पहाड़ पर भेजा जाता है' 'अगर लकड़ी नहीं दी तो अभी यही से फेक दूंगा तुम दोनों को' तभी वह खड़े एक पण्डे में मेरे सर पर पीछे से बहुत से थपक मारा [ मेरा तो सर ही चकरा गया था एक दम से] फिर पुलिस वाले थे बोल अब भी समय है मान लो की तुमने लकड़ी फेकदी, फिर जहाँ  पांचवी टोंक पर चरण बने है उसके साइड में एक छोटा सा दरवाजा है जहाँ  पुलिस वाला हम दोनों को ले गया, और हम दोनों को फिर उसने मानसिक रूप से बहुत प्रताड़ित किया और हमको उठक-बैठक लगाने को कहा !

मरता क्या ना करता हम अकेले थे, मजबूर थे, हमने उठक-बैठक लगानी शुरू की, हमारा गला बिलकुल सुखा हुआ था हमें प्यास लगी थी, उस पुलिस वाले में पानी पिया और मैंने भी माँगा तो गाली देने लगा और पानी नहीं दिया जबकि वह दो मटके पानी के भरे हुए रखे थे, उस समय मुझे लगा मानो मैंने कोई बहुत बुरा अपराध किया जो मुझे ये सजा मिल रही है और मन में आया की नेमिनाथ भगवान ने जहाँ  से कर्मो को तोड़ किया और मोक्ष प्राप्त किया, क्या ऐसी पवित्र जगह पर आना ही मेरा अपराध है ??? उस समय सन्मति भाई और मुझे लगा शायद हमारे साथ कुछ होता है तो शायद वो अब तो जैन समाज के लिए 'जगाने' का काम कर जाए क्योकि हम अहिंसा की आड़ में कायर हो चुके है, फिर सन्मति भाई ने कहा की णमोकार का मन में जाप करो और नेमिनाथ भगवन को याद करो अगर कुछ होता भी है तो शांति से बस भगवान् को याद करते रहो ! तब तक हमारे ग्रुप में ये बात पहुच गयी थी की दो सदस्यों को बंधक बनाया गया है और उनको परेशान किए जा रहा है, और तभी चन्द्र प्रकाश मित्तल जी ने निचे आचार्य निर्मलसागर जी महाराज के साथ में रहने वाले ब्रम्हचारी भैया को फ़ोन लगाया और उनको परिस्थिति बताई क्योकि चन्द्र प्रकाश मित्तल जी नहीं चाहते थे की कोई अप्रिय घटना हो, वे चाहते थे शांति से निपटारा हो और हम लड़ाई के लिए नहीं बल्कि दर्शन के लिए आये थे, तब ब्रम्हचारी भैया ने कहा की वे पुलिस ऑफिस जा रहे है और आप उस पुलिस वाला को जिसने दो लोगों को बंधक बनाया है उस पुलिस वाले को बोलो की तुम्हारी शिकायत नीचे की जा चुकी है और अब हमारे साथियों को छोड़ दे वरना, तुम्हारी खैर नहीं !

पुलिस वाला हमसे कहने लगा तुम्हारे साथ और कौन लोग थे, तो हमने कहा हम लोग ग्रुप में आये है लगभग 450 लोग है और तो पूछने लगा कहा से आये हो तो हमने कहा दिल्ली से तो फिर गालियाँ  देने वाला ! हम दोनों हाथ जोड़ जोड़ कर थक गए कहते कहते की हमने कुछ नहीं किया और हमें छोड़ दे या फिर अगर केस करना भी है तो थाने चल पर यहाँ हमें बंधक जैसा क्यों रखा हुआ है !! फिर उसने कहा अपने साथियों  को फ़ोन लगा, बहुत ही बत्तामीजी से बोल रहा था, मानो हम कोई गंभीर अपराध करके आयो हो तब वह सिग्नल भी नहीं मिलते पर थोड़ी देर बाद चन्द्र प्रकाश मित्तल जी का फ़ोन मिल गया मैंने उनको बताया की पुलिस वाले तथा पंडो ने हमें बंधक बनाया है और आपको आने के लिए बोल रहा है, तब मैंने पुलिस वाले को कहा की डायरेक्ट बार कार्लो तो वो बात करने के लिए रेडी नहीं था लेकिन बार बार कहने पर उसने चन्द्र प्रकाश मित्तल जी से फ़ोन पर बात की ! तब चन्द्र प्रकाश मित्तल जी पुलिस वाले को यही सब कहा की तुम्हारा नाम क्या है, और तुमने हमारे साथियों को बंधक क्यों बनाया और अगर उन दोनों ने कुछ किया भी है तो उनको थाने क्यों नहीं लेकर गए वह पांचवी टोंक पर क्यों रखा है उनको, और काफी कहने के बाद भी पुलिस वाले ने अपना नाम नि बताया, तब फिर चन्द्र प्रकाश मित्तल जी ने कहा की तुमारी शिकायत की जा चुकी है अब हमारे साथियों को छोड़ दो वरना तुम्हारी खैर नहीं ! तभी हमारे ग्रुप से एक भैया [विपिन जैन] वहा पांचवी टोंक पर पहुँचे  तो पंडा उनको रोकने लगा तब विपिन भैया ने कहा मुझे तुमसे नहीं पुलिस वाले से बात करनी है तू साइड हो जा अब, तब विपिन भैया ने कहा इन दोनों ने क्या किया है जो इनको बंधक क्यों बनाया है और इनको छोड़ दो और अगर कुछ करना भी है थाने चलते है वही बात होगी, तब पुलिस वाले ने महंत से पूछा की क्या मैं इन दोनों को छोड़ दूं, जैसे कुत्ता मालिक के कहे बिना एक साँस भी नहीं लेता, तब महंत ने कहा हाँ तो पुलिस वाले ने छोड़ दिया !


फिर हम निचे उतरने लगे और साथ में पुलिस वाला भी उतर रहा था, तब वही निचे उतारते हुए आश्रम पड़ा जहाँ  पर हमारे ग्रुप के लगभग 100 लोग पहुच चुके थे वहा एक पुलिस वाला पहले से था और एक ये जो हमारे साथ आया था इस तरह दो पुलिस वाले थे अब, तब हमारे ग्रुप से कुछ वरिष्ठ लोगों ने पुलिस वाले से कहा आप लोगों को यहाँ पहाड़ पर दर्शन करने वालो की सुरक्षा के लिए रखा गया है तथा ये वर्दी जिसको आप पहने हो ये भारत की आन शान है अगर आप लोग ही वर्दी में ऐसे काम करोगे तो हम सामान्य जनता कहा जायेगी ? अगर रक्षक ही भक्षक बनेगा तो हम कहा जायेंगे और क्या आप दोनों पुलिस वालो को लगता है की हम सफ़ेद कपडे पहनकर महिलाओ और बच्चे के साथ यहाँ कुछ व्यवस्था बिगाड़ने आये थे ? क्या यहाँ हम विवाद करने आया है ? जिनका पुलिस वाले के पास कोई उत्तर नहीं था, फिर हमने उस पुलिस वाले का नाम लिखा और फोटो ली, [दोनों पुलिस वाले फोटो और नाम देने के लिए रेडी नहीं थे, बड़ी मुश्किल से हमने फोटो ली ] फिर सन्मति भाई और मुझे बहुत ज्यादा प्यास लगी थी मानो गला सुख गया था, लेकिन आपको बता दे की हम 450 लोगों ने प्रण किया था की खाने की तो बात दूर है, चाहे प्राण निकल जाए पर हम पहाड़ पर एक पानी की बोतल नहीं खरीदेंगे, लगभग 1000 सीढ़ियाँ  उतरने के बाद प्रथम टोंक आई वहा हम सबने पानी पिया, वहा मंदिर में अन्दर सब पानी की व्यवस्था है, और फिर हमारे भाव ये भी थे की जिन लोगों ने पहाड़ पर धर्मं के नाम पर गुंडागर्दी मचाई है उनको तो बिलकुल भी सपोर्ट नी करना ! फिर हम पहली टोंक पर आये और सबने भाव से दर्शन किया तथा लगभग 150 ने अभिषेक तथा सामूहिक पूजन किया !

नीचे आकर हम आचार्य निर्मलसागर जी महाराज जी से मिले तथा हमने कहा कि हम एफआईआर  करवाना चाहते है आदि बातें  बताई तो ब्रम्चारी भैया ने हम को कुछ फ़ोन नंबर दिए तब हम लगभग 100 लोग आईएएस  ऑफिसर से मिलने गए [तब धुप बहुत तेज थी ऊपर  से हम बहुत थके हुए थे पर हम नहीं चाहते थे की आगे भी किसी के साथ हो इसलिए हमारी धर्मं भावना के आगे शारीरिक थकान का हमें पता ही नहीं चला] आईएएस  ऑफिसर से हम लोग मिले और उनसे सब बातें  बताई जिसमें  हम अमित मोदी, चन्द्र प्रकाश मित्तल, सन्मति जैन तथा निपुण जैन [ मैं ] हम चारो victim थे, तथा सारी बातें  सुनने के बाद आईएस ऑफिसर जो थे उन्होंने तभी एसीपी  तथा डीसीपी  साहब को फ़ोन किया और ये सारी बातें  बताई तथा कहा की अगर पर्यटकों के साथ ऐसा होता है तो ये बिलकुल भी सहन नहीं होगा इससे गुजरात का नाम खराब होगा, और हम जानते है आप जैन लोग सरल स्वाभावि होते है, फिर उन्होंने एक विशेष बात बोली उस पुलिस वाले के बारे में 'वो जिसकी खाता है उसकी ही गाता है'. हम पुलिस के अल अधिकारी से ये बात सुनकर बड़े अचम्भे में थे तथा वे बहुत हैरान हुए जब उन्होंने मेरे से सुना कि  पुलिसवाले ने खुद दो डंडे मुझे बारे, तब उन्होंने फिर डीसीपी  साहब के पास जाने का हम सबको कहा तथा हमारी एप्लीकेशन की एक कॉपी अपने पास रखी !

फिर हम डीसीपी साहब के पास गए उनको बातें  बताई तो वे भी थोडा हैरान थे, और उन्होंने तभी कांस्टेबल को बुलाया और कहा इन चारो लोगों के बयान दर्ज करो और अभी पहाड़ पर जाओ और उस पुलिसवाले और सब पंडो को पकड़ कर इनसे शिनाख्त करवा कर उनको उठा कर लाओ ! (वाह रे डीसीपी जैसे आप उनको थाने में नहीं बुला सकते थे और फिर पहचान करवाते है ) (सब मिले हुए हैं !!!!)

फिर हम निर्मलसागर जी महाराज के पास गए और उनको सारा वाकया सुनाया कि डीसीपी साहब ने अभी हमको पहाड़ चढ़कर पंडे और पुलिसवाले की पहचान करने को कहा है, हमें अभी पहाड़ पर जाना होगा तब शाम के 7 बजे चुके थे.  तब महाराज जी बोले जो पण्डे दिन के टाइम में पुलिस वाले के साथ मिलकर ऐसा कर सकते है तो रात को तो आपके साथ कुछ भी हो सकता है और हम पुलिस पर भी विश्वास कैसे करे, जब पुलिस वाला पहाड़ पर भी उनके साथ था ? फिर शाम को जाना तो मतलब रात को १-२ बजे तक वापस आना फिर हम ऐसी परिस्थिति में भी नहीं थे कि पहाड़ पर जा पाए हम बहुत थके हुए थे फिर पूरा दिन फिरते फिरते हो गया था ऊपर  से हमने पहले दिन ही खाना खाया था, पूरा से दिन हम भूखे थे, महाराज जी ने कहा जब आप पुलिस वाले का नाम और फोटो दे रहे हो तो उसको पुलिस वाले पकड़ कर क्यों नहीं लाते और थाने में शिनाख्त करवाते ? फिर वो पुलिस वाला ही सब पंडो के नाम भी बताएगा ! तथा महंत भी तो एक ही है तब हमें लगा की मामला इतना सीधा नहीं है फिर जूनागढ़ या कही से कोई हमें guide करने भी नहीं आया ! फिर हवालदार रात को 9 बजे आया की अब चलो पहाड़ पर जैसे कोई बच्चो का खेल हो पहाड़ पर जाना ! तब हमने जाने से इनकार कर दिया और हम फिर उसी रात अहमदाबाद आ गये जहाँ से हमें ट्रेन से दिल्ली वापस आना था!

बस इतना कहना चाहूँगा या तो गिरनार का अस्तित्व भूल जाओ या फिर आगे आकर गिरनार संरक्षण के लिए सम्यक पुरुषार्थ करलो ! ~ श्री सिद्ध क्षेत्र गिरनार की रक्षा, है कर्त्तव्य हमारा, गिरनार तीर्थ है प्यारा, जहाँ नेमी प्रभु ने मोक्ष प्राप्त कर, जीवन अपना संवारा! गिरनार तीर्थ है प्यारा ! जय नेमिनाथ, प्रभु नेमिनाथ !! ये हृदय कम्पित करदेने वाला वाकया  हमारे साथ हुआ जिसको  [निपुण जैन] ने लिखा -

Friday, January 4, 2013

जैन मुनि पर हमला: अहिंसक जैन समाज में आक्रोश


गुजरात : दिगंबर जैन मुनि पर प्राणघातक हमला, दो श्वेताम्बर मुनियों को ट्रक ने कुचला
इन दुर्घटनाओं के विरोध में जैन समाज ने की बोरीवली में आपात बैठक

मुंबई
२ जनवरी २०१३। जैन धर्मावलंबियों के लिए नववर्ष दुखद घटनाएँ लेकर आया है. एक दुर्घटना गिरनार, जूनागढ़ की है तो दूसरी भरूच की है. इन दुर्घटनाओं के विरोध में जैन समाज ने की बोरीवली में आपात बैठक का आयोजन किया, जिसमें बृहत् मुंबई के सभी उपनगरों एवं दक्षिण मुंबई से काफी संख्या में समाज के गणमान्य सदस्यों एवं श्रावकों ने भाग लिया. 

जैन मुनि पर हुए हमले के विरोध में सम्पूर्ण जैन समाज आगामी 7 जनवरी  २०१३ को प्रातः ९ बजे से हीरा बाज़ार से आजाद मैदान तक मुंह पर काली पट्टियां बांधकर विरोध रैली निकालेगा और प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति एवं गुजरात के मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन महाराष्ट्र के राज्यपाल को सौंपा जाएगा । 

ज्ञात हो कि 1 जनवरी को सायं ६ बजे मुनिश्री प्रबल सागर जी महाराज सिद्धक्षेत्र गिरनार (गुजरात) में पांचवी टोंक (कमल कुण्ड) से वापसी कर रहे थे, तब कुछ असामाजिक तत्वों एवं स्थानीय पंडों द्वारा मुनिश्री पर चाकुओं से प्राणघातक हमला किया गया, इसमें मुनिश्री के पेट में ५ घहरे घाव हुए और काफी रक्त बहता रहा जिससे मुनि तुरंत बेहोश हो गए. घायल अवस्था और कडाके की ठिठुरती ठण्ड में भी दिगंबर मुनि घंटों पहाड़ पर ही पड़े रहे, रात को करीब १ बजे उन्हें पालकी वालों ने पहाड़ से नीचे उतारा और फिर रोगिवाहिका से जूनागढ़ के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ उनका ऑपरेशन हुआ पर अभी भी उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है.

ध्यान दें कि दिगंबर मुनि दीक्षा लेने के बाद कभी भी किसी प्रकार के वाहन का इस्तेमाल नहीं करते और ना ही रात्रिकाल में एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं. दिन में एक बार ही आहार-जल ग्रहण करते हैं. सभी जीवों के प्रति करुणा से ओतप्रोत होते हैं. हमेशा पैदल ही विहार करते हैं और सर्दी-गर्मी अथवा बरसात में भी किसी प्रकार के आवरण का इस्तेमाल नहीं करते. मयूरपंख से बनी पिच्छिका एवं कमंडल के अलावा कोई भी वस्तु अपने साथ नहीं रखते और रोगी होने पर भी चिकित्सालय में जाकर उपचार नहीं लेते हैं. यह सब उनकी दीक्षा के प्राथमिक नियम होते हैं. इस घटनाक्रम से मुनिश्री की दीक्षा का विच्छेद हो गया है क्योंकि उन्हें बेहोश अवस्था में ही रात के समय अस्पताल में भर्ती कर दिया गया. जैनधर्म के इतिहास में यह दुर्घटना काले अध्याय के सामान है जिसे कभी समाज भुला नहीं सकता.

गिरनार तीर्थ पर जैनों और समाजकंटकों के बीच पिछले १५ वर्षों से विवाद चल रहा है जबकि मूल रूप से यह जैन तीर्थ जैनधर्म के २२ तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान् की निर्वाण स्थली है. जिसपर समाजकंटकों ने जबरन कब्ज़ा कर रखा है जो हमेशा जैन तीर्थ यात्रियों को धमकाते रहते हैं, अभद्र व्यवहार करते हैं. गुजरात उच्च न्यायालय ने २१  दिसम्बर २००४ में गिरनार जी की पांचवी टोंक पर से अनधिकृत कब्जा और गैर-क़ानूनी रूप से स्थापित दत्तात्रय की मूर्ति को २८ दिसम्बर २००४ तक हटाने के आदेश दिए थे और यह भी आदेश दिए गए थे कि २८ दिसम्बर २००४ तक न हटाये जाने पर सम्बंधित विभागों को जबरन हटाने हेतु आदेश दिए जायेंगे! 

लेकिन मार्च
२००५ में हाई कोर्ट ने अपने २१  दिसम्बर २००४ के आदेश को बदलते हुए नए आदेश में भविष्य में पांचवी टोंक पर किसी भी नए निर्माण पर रोक लगा दी थी और एक कमेटी का गठन किया जिसे इस विषय में सारी जानकारी इकट्ठी करके अगले महीनों में (मतलब नवम्बर, २००५ तक)..गुजरात उच्च न्यायालय को सौंपना था.
 
साथ ही इसी दिन
भरूच (गुजरात) के पास  पास राष्ट्रीय राजमार्ग  पर मंगलवार  को दो श्वेताम्बर जैन साधुओ  श्री ज्ञानेश्वर विजय महाराज और श्री हस्तिगिरी विजय  महाराज  को विहार के समय ट्रक से कुचला गया और वे घटनास्थल पर ही देवगति को प्राप्त हुए। ट्रक चालक दुर्घटना के बाद मौके से भाग निकले. गुजरात में पिछले २० दिनों में ऐसी १० घटनाएं हो चुकी हैं. जिनकी जाँच सीबीआई को सौंपी जानी चाहिए. भारत सरकार एवं गुजरात सरकार से ट्रक चालक को गिरफ्तार कर उस पर कानूनी कार्यवाही करने की मांग की।

मुनि पर इस हुए हमले की समस्त ने जैन समाज घोर निन्दा कर हमलावरों को गिरफ्तार कर उस पर कठोरतम कानूनी कार्यवाही करने एवं गिरनार तीर्थ पर पुलिस व्यवस्था कड़ी करने की मांग की।


Wednesday, January 2, 2013

चलो गिरनार: अभी नहीं तो कभी नहीं - हमारे तीर्थ/मंदिर और साधुओं को सुरक्षा दो, वर्ना गद्दी छोड़ो


[ घटना १: गुजरात के गिरनार पर्वत दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र पर १ जनवरी २०१३ को मुनिश्री १०८ प्रबल सागर जी महाराज पर पंडों द्वारा चाकुओं से प्राणघातक हमला, मुनि गंभीर, मुनि दीक्षा का हुआ विच्छेद, अस्पताल में करना पड़ा भर्ती.

घटना २: भड़ूच में दो श्वेताम्बर मुनियों की ट्रक से कुचलकर नृशंस हत्या कर दी गयी, जैन संघ के लिए ये दोनों घटनाएँ शोक लेकर आई हैं २०१३ का क्या है भविष्य)

देश के हर प्रदेश की जैन संस्थाएँ एक तारीख सुनिश्चित करके गिरनार और गुजरात की राजधानी ‘गांधीनगर में एक विशाल निकालें और गिरनार के पहाड़ पर कब्ज़ा करना चाहिए

जैन तीर्थों और जैन मुनियों की सुरक्षा एवं जैनों को अखिल भारतीय स्तर पर ‘अल्पसंख्यक’ दर्जे की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय  में तुरंत एक जनहित याचिका दाखिल की जानी चाहिए.

भारत की विकास दर और कर चुकाने के मामले में जैन समाज का योगदान सबसे ऊपर है फिर भी सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करती, हमारे मुनियों और तीर्थों पर हमलों की घटनाएँ हर दिन बढ़ रही हैं .

क्या हम अंधे, बहरे और लाचार हो गये है, कि हमे भिखारी समझा जा रहा है? या फिर हम एक अनचाहा अंग है भारत का? क्या भारत के अजैन जैनोंसे इतने असुरक्षित हैं कि उनपर, उनके तीर्थों और उनके आराध्य मुनियों पर हमले करना, उन्हें कुचलना ही एक बहुसंख्य समाज का आखरी रास्ता बचा है?

देशभर के सभी जैन व्यापारी चाहे दिगंबर हो या श्वेताम्बर एक दिन नक्की करो और उस दिन अपनी दुकानें, कम्पनियाँ, कारखाने, जैन सीए/सीएस/डॉ./वकील/इंजीनियर आदि के दफ्तर पूरी तरह बंद कर दो.
जब तक हम जैन  देशव्यापी व्यवसाय बंद नही करेंगे तब तक यह सरकार जागने वाली नही है।

जैनों के प्रतिनिधि मंडल देश की हर राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मिलें और ज्ञापन सौंपें. कह दो जब तक इन बातों का निराकरण नहीं हो जाता, विश्राम नहीं करेंगे. अब हमें इन सब हमलों का जवाब चाहिए. समाधान चाहिए. अब चुप नहीं बैठेंगे.