Monday, March 26, 2012

एक विनम्र अपील: हिंदी संक्षेपाक्षरों को बढ़ावा दीजिए


एक विनम्र अपील: हिंदी संक्षेपाक्षरों को बढ़ावा दीजिए
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कारण हिंदी की ताकत तो बढ़ रही है और आप जैसे हिंदी चैनल /पत्रिका/समाचार-पत्र ‘हिंदी’ के कारण ही करोड़ों-अरबों के मालिक बने हैं, नाम और ख्याति प्राप्त कर रहे हैं. आपसे अनुरोध है कि  कठिनता के नाम पर  प्रचलित हिंदी शब्दों को अपने चैनल /वेबसाईट/पत्रिका से मत निकालिए . अपने अख़बार/ वेबसाइट पर रोमन लिपि का इस्तेमाल बंद कर दीजिए आज जो स्थिति है उसे देखकर लगता है कि भारत की हिंदी भी फिजी हिंदी की तरह कुछ वर्षों में मीडिया की बदौलत रोमन में ही लिखी जाएगी!!!

मुझे हिंदी से प्यार है इसलिए बड़ी खीझ उठती है, दुःख होता है. डर भी लगता है कि कहीं हिंदी के अंकों (१,२,३,४,५,६,७,८,०) की तरह धीरे-२ हमारी लिपि को भी हकाला जा रहा है. आज हिंदी अंक इतिहास बन चुके हैं, पर भला हो गूगल का जिसने इनको पुनर्जीवित कर दिया है.

हिंदी संक्षेपाक्षर सदियों से इस्तेमाल होते आ रहे हैं, मराठी में तो आज भी संक्षेपाक्षर का प्रयोग भरपूर किया जाता है और नये-२ संक्षेपाक्षर बनाये जाते हैं पर आज का हिंदी मीडिया इससे परहेज़ कर रहा है, देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का उपयोग कर रहा है. साथ ही मीडिया हिंदी लिपि एवं हिंदी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को हिंदी के प्रचार में बाधा मानता है, जो पूरी तरह से निराधार और गलत है.

“हिंदी हमारी अपनी भाषा है, इसके विकास की जिम्मेदारी हम सब पर है और मीडिया की ज़िम्मेदारी सबसे ऊपर है.”
“मैं ये मानता हूँ कि बोलचाल की भाषा में हिंदी संक्षेपाक्षरों की सीमा है पर कम से कम लेखन की भाषा में इनके प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए और जब सरल हिंदी संक्षेपाक्षर उपलब्ध हो या बनाया जा सकता हो तो अंग्रेजी संक्षेपाक्षर का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.”

मैं अनुरोध करूँगा कि नए-नए सरल हिंदी संक्षेपाक्षर बनाये जाएँ और उनका भरपूर इस्तेमाल किया जाये, मैं यहाँ कुछ हिंदी संक्षेपाक्षरों की सूची देना चाहता हूँ जो हैं तो पहले से प्रचलन में हैं अथवा इनको कुछ स्थानों पर इस्तेमाल किया जाता है पर उनका प्रचार किया जाना चाहिए, आपको कुछ अटपटे और अजीब भी लग सकते हैं, पर जब हम एक विदेशी भाषा अंग्रेजी के सैकड़ों अटपटे शब्दों/व्याकरण को स्वीकार कर चुके हैं तो अपनी भाषा के थोड़े-बहुत अटपटे संक्षेपाक्षरों को भी पचा सकते हैं बस सोच बदलने की ज़रूरत है.

कुछ हिंदी संक्षेपाक्षरों की सूची

राजनीतिक दल/गठबंधन/संगठन :

राजग: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन [एनडीए]
संप्रग: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [यूपीए]
तेदेपा: तेलुगु देशम पार्टी [टीडीपी]
अन्ना द्रमुक: अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम[ अन्ना डीएमके]
द्रमुक: द्रविड़ मुनेत्र कषगम [डीएमके]
भाजपा: भारतीय जनता पार्टी [बीजेपी]
रालोद : राष्ट्रीय लोक दल [आरएलडी]
बसपा: बहुजन समाज पार्टी [बीएसपी]
मनसे: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना [एमएनएस]
माकपा: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी [सीपीएम]
भाकपा: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी [सीपीआई]
राजद: राष्ट्रीय जनता दल [आरजेडी]
बीजद: बीजू जनता दल [बीजेडी]
तेरास: तेलंगाना राष्ट्र समिति [टीआरएस]
नेका: नेशनल कॉन्फ्रेन्स
राकांपा : राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी [एनसीपी]
अस: अहिंसा संघ
असे: अहिंसा सेना
गोजमुमो:गोरखा जन मुक्ति मोर्चा
अभागोली:अखिल भारतीय गोरखा लीग
मगोपा:महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी)
पामक : पाटाली मक्कल कच्ची (पीएमके)  
गोलिआ:गोरखा लिबरेशन आर्गेनाइजेशन (जीएलओ)

संस्थाएँ
अंक्रिप = अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद [आईसीसी]
संसंस : संयुक्त संसदीय समिति [जेपीसी]
आस: आयोजन समिति [ओसी]
प्रेट्र:प्रेस ट्रस्ट [पीटीआई]
नेबुट्र:नेशनल बुक ट्रस्ट
अमुको : अंतर्राष्ट्रीय  मुद्रा कोष [आई एम एफ ]
भाक्रिनिम : भारतीय क्रिकेट नियंत्रण मंडल/ बोर्ड [बीसीसीआई]
केमाशिम : केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल/बोर्ड [सीबीएसई]
व्यापम: व्यावसायिक परीक्षा मंडल
माशिम: माध्यमिक शिक्षा मण्डल
राराविप्रा: राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण [एनएचएआई]
केअब्यू : केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो [सीबीआई]
मनपा: महानगर पालिका
दिमनपा: दिल्ली महानगर पालिका [एमसीडी]
बृमनपा: बृहन मुंबई महानगर पालिका [बीएमसी]
भाकृअप : भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद
भाखेम : भारतीय खेल महासंघ
भाओस : भारतीय ओलम्पिक संघ [आईओए]
मुमक्षेविप्रा: मुंबई महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण [एमएमआरडीए ]
भापुस : भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण [एएसआई]
क्षेपका : क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय [आरटीओ]
कर: कम्पनी रजिस्ट्रार [आरओसी]
जनवि: जवाहर नवोदय विद्यालय
नविस : नवोदय विद्यालय समिति
सरां: संयुक्त राष्ट्र
राताविनि:राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम [एनटीपीसी]
रासंनि:राष्ट्रीय संस्कृति निधि [एनसीएफ ]
सीसुब: सीमा सुरक्षा बल [बीएसएफ]
रारेपुब: राजकीय रेलवे पुलिस बल
इविप्रा : इन्दौर विकास प्राधिकरण [आईडीए]
देविप्रा: देवास विकास प्राधिकरण
दिविप्रा : दिल्ली विकास प्राधिकरण [डीडीए]
त्वकाब : त्वरित कार्य बल
राराक्षे : राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र [एनसीआर]
भाजीबीनि : भारतीय जीवन बीमा निगम [एलआईसी]
भारिबैं: भारतीय रिज़र्व बैंक [आरबीआई]
भास्टेबैं: भारतीय स्टेट बैंक [एसबीआई]
औसुब : औद्योगिक सुरक्षा बल
अभाआस:अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान [एम्स]
नाविमनि: नागर विमानन महानिदेशालय [डीजीसीए]  
अंओस: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी)
रासूविके: राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र [एनआईसी]
विजांद: विशेष जांच दल [एसआईटी]
भाप्रविबो:भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी)
केरिपुब: केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ)
भाअअस: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)
भाबाकप:भारतीय बाल कल्याण परिषद
केप्रकबो: केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी)
केसआ:केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी)
भाप्रस: भारतीय प्रबंध संस्थान [आई आई एम]
भाप्रौस : भारतीय प्रबंध संस्थान [आई आई टी ]

अन्य :
मंस : मंत्री समूह
जासके : जागरण सम्वाद केन्द्र
जाससे:जागरण समाचार सेवा
अनाप्र: अनापत्ति प्रमाणपत्र
इआप: इलेक्ट्रोनिक आरक्षण पर्ची
राग्रास्वामि : राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन [एनआरएचएम]
कृपृउ : कृपया पृष्ठ उलटिए
रासामि : राष्ट्रीय साक्षरता मिशन
रनाटै मार्ग  : रवीन्द्रनाथ टैगोर मार्ग
जलाने मार्ग: जवाहर लाल नेहरु मार्ग
अपिव: अन्य पिछड़ा वर्ग [ओबीसी]
अजा: अनुसूचित जाति [एससी]
अजजा: अनुसूचित जन जाति [एसटी]
टेटे : टेबल टेनिस
मिआसा- मिथाइल आइसो साइनाइट
इवोम- इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन [ईवीएम]
स्वटिविम- स्वचालित टिकट विक्रय मशीन
स्वगम: स्वचालित गणना मशीन  [एटीएम]
यूका:यूनियन कार्बाइड
ऑटैम : ऑटोमेटिक टैलर मशीन [एटीएम]
मुम: मुख्यमंत्री
प्रम : प्रधान मंत्री
विम: वित्तमंत्री/ विदेश मंत्री
रम : रक्षा मंत्री
गृम : गृह मंत्री/ मंत्रालय
प्रका: प्रधानमंत्री कार्यालय [पीएमओ]
पुअ:पुलिस अधीक्षक [एसपी] 
शिगुप्रक:शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी [एसजीपीसी]  
रामखे:राष्ट्रमंडल खेल [सीडब्ल्यूजी]
पुमनि:पुलिस महानिदेशक [डीजीपी] 
जहिया:जनहित याचिका [पीआइएल]
गैनिस: गैर-निष्पादक सम्पतियाँ (एनपीए)
सभागप:समर्पित भाड़ा गलियारा परियोजना
सानियो: सामूहिक निवेश योजना (सीआईएस)  
अमलेप:अंकेक्षक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी)
सराअ :संयुक्त राज्य अमरीका  [यूएसए]
आक: आयकर
सेक : सेवाकर
वसेक : वस्तु एवं सेवा कर [जीएसटी]
केविक: केन्द्रीय विक्रय कर [सीएसटी]
मूवक: मूल्य वर्द्धित कर [वैट]
सघउ : सकल घरेलु उत्पाद [जीडीपी]
नआअ: नगद आरक्षी अनुपात [सीआरआर]
प्रमग्रासयो: प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना
विस: वित्त समिति
प्रस: प्रचार समिति
व्यस :व्यवस्था समिति
न्याम: न्यासी मण्डल
ननि : नगर निगम
नपा: नगर पालिका
नप: नगर पंचायत

फ़िल्में :
ज़िनामिदो : जिंदगी ना मिलेगी दोबारा [ज़ेएनएमडी]
दिदुलेजा: दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे [डीडीएलजे]
कखुकग: कभी खुशी कभी गम [के३जी]
पासिंतो :पान सिंह तोमर
मैंप्याकि : मैंने प्यार किया

धारावाहिक:
कुलोक : कुछ तो लोग कहेंगे
बअल: बड़े अच्छे लगते हैं
जीइकाना: जीना इसी का नाम है
दीबाह: दीया और बाती हम 

Friday, March 23, 2012

Shaheed Diwas Greetings


For many of us 23 March may be just another day in the calendar year when we get on with our daily routines. However, it is a day where we need to remember the greatest of sacrifices made by three young men in India’s quest for Independence and Freedom from British rule.
On March 23, 1931, Bhagat Singh was hanged in Lahore with his fellow comrades Rajguru and Sukhdev. Since then 23 march is known as Shaheed Diwas.
Bhagat Singh was a revolutionary and was a constant source of trouble for British in India. But the two major events that were the reasons for his execution were the Bombing of the Assembly and the Saunders murder.
Bhagat Singh, Rajguru, and Sukhdev were charged with the murder and the assembly bombing case. Bhagat Singh decided to use the court as a tool to publicize his cause for the independence of India. He admitted to the murder and made statements against the British rule during the trial. While in jail, Bhagat Singh and other prisoners launched a hunger strike advocating for the rights of prisoners and those facing trial.
All three were finally hanged on 23 March 1931 amidst thunderous shouts of Inquilab Zindabad from other inmates inside the jail. “Long Live Revolution”
an article from Dharmayug
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है :


Wednesday, March 14, 2012

Greetings for Adinath Jayanti आदिनाथ जयंती


ऋषभदेव जन्म कल्याणक पर्व :

प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभ जयंती पर्व मनाया जाता है। इस दिन इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म हुआ था। वर्तमान अवसर्पिणी के तृतीय काल में चौदह मनु (कुलकर) हुए जिनमें चौदहवें मनु नाभिराय थे। इन्हीं नाभिराय और उनकी पत्नी मरूदेवि के चैत्र कृष्ण नवमी के दिन उत्तराषाढ नक्षत्र और ब्रह्म नामक महायोग में मति, श्रुत और अवधिज्ञान के धारक पुत्र का जन्म अयोध्या में हुआ था। इन्द्रों ने बालक का सुमेरु पर्वर पर अभिशेक महोत्सव करके ‘ऋषभ’ नाम रखा गया।

ऋषभदेव के अनेक नाम

ऋषभदेव के हिरण्यगर्भ, स्वयंभू, विधाता, प्रजापति, इश्वाक, पुरुदेव, वृषभदेव, आदिनाथ इत्यादि अनेक नाम पाये जाते हैं। महापुराण के अनुसार चूंकि उनके स्वर्गावतरण के समय माता ने वृषभ को देखा था, अतः वे वृषभ नाम से पुकारे गये। कल्पसूत्र में उपर्युक्त कारण के अतिरिक्त उनके उरुस्थल पर वृषभ का चिन्ह होने का कारण भी उल्लिखित किया है। भागवत पुराण के अनुसार उनके सुन्दर शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश और पराक्रम प्रभूति सद्गुणों के कारण महाराजा नाभि ने उनका ‘ऋषभ’ नाम रखा। वृषभदेव जगत भर में ज्येष्ठ हैं और जगत का हित करने वाले धर्म रूपी अमृत की वर्षा करेंगे, एतदर्थ ही इन्द्र ने उनका नाम ‘वृषभदेव’ रखा। वृष श्रेष्ठ को कहते है। भगवान श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हैं, इसलिये भी इन्द्र उन्हें ‘वृषभस्वामी’ के नाम से पुकारा। जब वे गभग में थे तभी हिरण्य (स्वर्ण) की वर्षा हुई थी, इसलिये देवों ने उन्हें ‘हिरण्यगर्भ’ कहा। वर्तमान जन्म से पूर्व तीसरे जन्म जो तीन ज्ञान प्रकट हुए थे उन्हीं के साथ वे उत्पन्न हुए इसलिये ‘स्वयम्भु’ कहे जाते हैं। उन्होंने भारत क्षेत्र में नाना प्रकार की व्यवस्थाएं की, अतः वे ‘विधाता’ कहे जाते हैं। वे सब ओर से प्रजा की रक्षा करते हुए ही प्रभु हुए, अतः ‘प्रजापति’ कहलाते हैं। उनके रहते हुए प्रजा ने इक्षु रस का आस्वादन किया, इस लिये उन्हे इक्ष्वाकु कहते हैं। वे समस्त पुराण पुरुषों में प्रथम थे, महिमा के धारक और महान थे तथा अतिशय देदीप्यमान थे अतः उन्हें ‘पुरुदेव’ कहते हैं। धर्म कर्म के आदिप्रवक्ता होने के कारण ऋषभदेव को आदिनाथ भी कहा जाता है।

गृहस्थ जीवन

ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर थे। जब वे युवा हुए तो नन्दा और सुनन्दा नामक कन्याओं के साथ उनका विवाह हुआ। नन्दा के भरत नामक चक्रवर्ती पुत्र और ब्रह्मी नामक पुत्री युगल रूप में उत्पन्न हुई। इन्हीं भरत ले नाम से इस देश का नाम भारत पडा।
भरत और ब्राह्मी के अतिरिक्त नन्दा रानी के वृषभसेन आदि अट्ठानवे पुत्र और हुए। सुनन्दा नामक दूसरी रानी के बाहुबली नामक पुत्र तथा अतिशय रूपवती सुन्दरी नामक पुत्री को जन्म दिया।

ऋषभदेव ने असि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और व्यापार इन छः विद्याओं का सूत्रपात किया। कृषि और उद्योग में अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। कर्मयोग की वह रसधारा बही कि उजडते और वीरान होते जन-जीवन में सब और नव वसंत खिल उठा, महक उठा। जनता ने उन्हें अपना स्वामी माना और धीरे-धीरे  बदलते हुए समय के अनुसार दण्ड-व्यवस्था, विवाह आदि समाज-व्यवस्था का निर्माण हुआ।

ऋषभदेव विषयक मान्यताएं

भागवत पुराण में ऋषभदेव को विष्णु का आठवां अवतार स्वीकार किया गया है। वहां कहा गया है कि भगवान विष्णु महाराजा नाभि का प्रिय करने के लिये उनके अंतःपुर की महारानी मरुदेवी के गर्भ में आए। उन्होने इस पवित्र शरीर का अवतार वातरशना श्रमण ऋषियों के धर्मों को प्रकट करने की इच्छा से ग्रहण किया।
  • ऋषभदेव ने साधक अवस्था में नग्न दिगम्बर वेष को अपनाया। शिव भी दिगम्बर वेषधारी स्वीकार किये जाते हैं।
  • ऋषभदेव की तप तथा निर्वाणभूमि कैलाशपर्वत मानी जाती है। शिव का भी निवास कैलाश पर्वत ही माना जाता है। भगवान ऋषभदेव का कैलाशपर्वत से निर्वाण हुआ तो चक्रवर्ती भरत ने उनके निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में कैलाश पर 72 चेत्यालय बनाये।
  • शिव का वाहन वृषभ है और ऋषभदेव का चिन्ह भी वृषभ है।
  • हिमवत पर्वत के पद्य द्रह से गंगा नदी निकलकर जिस स्थान पर गिरती है, वहाँ जटाजूट वाली खडगासन अकृत्रिम ऋषभदेवकी मूर्ति है। शिव के जटाजूट में गंगावतरण कहा जाता है।
  • शिव के अन्धकासुर नामक त्रिशूल से मिथ्यात्वअन्धकार-नाशक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्ररूप रत्नत्रय ग्रहण किये जा सकते हैं।
  • शिव के विषपान से ऋषभदेव से विकार पान का आशय है।
  • शिव को पशुपति कहा जाता है। ताण्ड्य और शतपथ ब्राह्मण में ऋषभ को पशुपति कहा है।
श्री, यश, शांति, धन, आत्मा, आदि अनेक अर्थों में पशु शब्द का व्यवहार वैदिक साहित्य में पाया जाता है। अतः पशुपति शब्द का अर्थ हुआ प्रजा, श्री, यश, धन, आत्मा, आदि का स्वामी। चूंकि ऋषभ इन सबके स्वामी थे अतः वे पशुपति कहलाए।

ऋषभदेव का वैराग्य
ऋषभ के जन्म से लेकर तेरासी लाख पूर्व व्यतीत हो गये तब इन्द्र को चिंता हुई कि मानवता का कल्याण करने के लिये तथा संसार को मुक्ति की राह दिखाने के लिये जिसका जन्म हुआ है वह भोगों में लिप्त हो रहा है। अतः ऋषभदेव को वैराग्योन्मुख करने के लिये इन्द्र ने नीलांजना नामक एक अप्सरा को नृत्य हेतु ऋषभदेव के दरबार में भेजा। उस अप्सरा की आयु अल्प थी, अतः वह नृत्य करते-करते ही विलीन हो गयी। इन्द्र ने ततक्षण वैसे ही रूपवाली दूसरी अप्सरा को नृत्य के लिये उपस्थित कर दिया। समय की क्षिप्रता के कारण इस बात को अन्य लोग नहीं जान सके। किंतु ऋषभदेव ने यह जान लिया और यह देखकर उन्हें संसार से विराग हो गया। तत्क्षण लौकांतिक देव आए। उन्होने ऋषभदेव के वैराग्य की प्रशंसा की। वे देवों द्वारा लायी शिविका पर चढकर सिद्धार्थ नामक वन में पहुँचे। वहाँ उन्होने अंतरंग और बहिरंग परिग्रह का त्याग संयम धारण कर लिया।

आहार प्राप्ति
छः माह बाद प्रतिमा योग का संकोचकर वे आहार के लिये चले। उस समय कोई आहार-दान की विधि नहीं जानता था, अतः छः माह तक निराहार विचरण करते रहे। अंत में पूर्व जन्म का स्मरण हो जाने पर श्रेयांस को आहारदान की विधि स्मृत हुई और उन्होंने उन्हें आहार दिया। सारी प्रजा ने खुशियाँ मनाई।

केवलज्ञान और निर्वाण
चार ज्ञान को धारण करने वाले ऋषभदेव ने स्वयं मोक्षतत्व का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिये एक हजार वर्ष तक नाना प्रकार का तप किया। लम्बी-लम्बी जटाओं के भार से सुशोभित हो रहे थे। अनंतर विहार करते हुए वे वृषभसेन के राज्य में पूर्वतालपुर नगर में आये। वहां वे शकटास्य नामक उद्यान में ध्यान धारणकर वटवृक्ष के नीचे एक शिला पर पर्याकांसन कर्मों का नाशकर केवल ज्ञान प्राप्त किया। दोनों ने उनके समवसरण की रचना की। भव्यजीवों को उपदेश देते हुए अंत में वे कैलाश पर्वत पर जा कर आरूढ हो गये और योगों का निरोधकर शेष चार अघातिया कर्मों का नाशकर मुक्ति प्राप्त की। उनकी कुल आयु चौरासी लाख पूर्व की हुई।
वर्तमान कर्मयुग और धर्मयुग के आदि सूत्रधार होने के कारण ऋषभदेव मानव संस्कृति के आद्य सृष्टा, विधाता और प्राण है। उनकी पावन जयंती हमें उन जैसा निस्पृह बनकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देती है। उनका पावन चरित्र स्पृहणीय और वन्दनीय है। हमें अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी जयंती-पर्व मनाना चाहिये।

Monday, December 5, 2011

Girnar is a Jain Pilgrimage_Disputed site

Temples Of Controversy

A dispute between religious heads of Hindu and Jain communities over sacred sites on Mt Girnar threatens to get out of hand, with efforts to resolve it moving from politics to the judiciary
By Uday Mahurkar

  PICTURE SPEAK
http://archives.digitaltoday.in/indiatoday/20060501/grfx/girnar2.jpg
SOFT SPOT: The shrine of Lord Dattatreya which has become a hotbed of religious rivalry
This is a mini-Mahabharata in the making. The two warring sides are the religious heads of the Hindu and Jain communities.

Their bone of contention: Mount Girnar in Gujarat's Junagarh district.

According to the Jains, it is the spot where the Jain Tirthankara Lord Neminath attained nirvana. According to Hindu spiritual leaders, however, Jains are illegally constructing religious structures as part of a grand expansion plan to capture the Girnar hills. That's a motive that Jain leaders also accuse the Hindu mahants, who control the shrines across the various peaks of Girnar, of harbouring. Besides, the mahants are preventing the Jains from worshipping in their shrines, Jain leaders complain.
"The authentic history of the place and many other valid sources say that the spot belongs to Lord Datta. The Jains have absolutely no right over the place, legally or otherwise," claims Swami Muktanand, who controls the Datta shrine located on the highest peak of Girnar.
Counters Sunil Kumar Jain, the assistant manager of Bandilal Jain Karkhana, a trust which manages some of the Jain religious spots on Girnar, says, "We want Jain pilgrims to be allowed to worship peacefully. Instead, they are often ill-treated by Hindu priests."
Though the conflict ranges over an extensive area, the battle is essentially for two spots-the footprint of Datta at the God's shrine on Peak No. 5 and the shrine of the ancient Hindu saint Gorakhnath on Peak No. 3, which also has an imprint of the saint's footprints.
The footprints of Gorakhnath are worshipped by Jains as being those of Jain saint Shambhukumarji.
   WAR OF WORDS
http://archives.digitaltoday.in/indiatoday/20060501/grfx/man1.jpg"The spot belongs to Lord Datta and the Jains have no right over the place."
SWAMI MUKTANAND
CONTROLLER, DATTA SHRINE
http://archives.digitaltoday.in/indiatoday/20060501/grfx/man2.jpg"Ill-treatment of Jain pilgrims should stop and they should be allowed to worship."
SUNIL KUMAR JAIN
ASSISTANT MANAGER OF BANDILAL JAIN TRUST
Conflict between the Jains and the Hindus started over the mysterious appearance of idols in 2004. The Jains claim that they found an idol of Lord Datta at Peak No. 5, and then discovered another image, of the Hindu deity Ramdev Pir, near the footprints of Gorakhnath.

Even as they were voicing their concern over the alleged illegal construction, a Jain sadhu was thrashed by Hindu priests at the Datta shrine for trying to remove flowers from the footprints of the deity, as according to Jain belief, flowers are alive and should not be used for worship.
The dispute took an ugly turn when Swami Muktanand filed a case against the Jains for trying to break the idol at Datta's shrine, which he claims has been there for ages.
After this, the state Archaeology Directorate also filed two cases against Jain leaders-one against Bandilal Trust, which led to the arrest of Sunil Kumar for trying to build a temple of a Jain goddess near a protected monument dedicated to Jain heroes Vastupal and Tejpal. They have been filed under the law that prevents construction within a 100-metre radius around the protected monument.
  PICTURE SPEAK
http://archives.digitaltoday.in/indiatoday/20060501/grfx/girnar.jpg
TALL CLAIMS: Statue of Narshi Mehta, a renowned Vaishnava saint, lords over the controversial site
The volley of charges from both sides continues to fly thick and fast in Mount Girnar, which is proclaimed by Hindu scriptures to be more sacred than the Himalayas.

The mahants allege the Jains have been systematically trying to change the character of the Girnar hills. According to them, many images of Hindu gods and goddesses have been replaced by Jains from the Raa Khengar Mahal, ruins of an ancient palace, with carved images of Jain gods, to give an impression that Girnar is essentially a Jain place of pilgrimage. Says Gopalanand, a Hindu monk, "We are not going to tolerate these moves by the Jains."
Ascribing cases of the so-called illegal construction on the part of Jains more to ignorance of laws than any design, Sunil Kumar says: "All we want is that Jain pilgrims be allowed to worship the footprints of Neminathji and Shambhukumarji, in keeping with the Jain tenets, at a fixed time in the day."
They allege that Hindu leaders are building a stone door on the path leading to a Jain shrine to block access. "Even the district administration is partial," Sunil Kumar says. Adds Acharya Nirmalsagarji, a Jain sadhu, "The situation is best described by the phrase jiski laathi uski bhains (those who have power can do anything).
Though Jain and Hindu leaders met Gujarat Chief Minister Narendra Modi in an effort to find an amicable solution to this religious crisis, nothing positive has emerged so far. In fact, attempts at mediation have been obscured in the maze of claims and counter-claims.
The conflict has assumed gigantic proportions over the years and now both sides have set their hopes on the Gujarat High Court, whose verdict in this case will be final and abiding. Among the warring leaders, however, there seems to be little concern for tolerance, judicial or otherwise. Holy wars may be decided by a higher court, and this one, judging by the location of the disputed area, is higher than most.